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सांस्कृतिक जागरण के मनीषी कवि थे प्रसाद

Thu, 15 Jan 2015 02:18 AM IST
वाराण्ासी, ब्यूरो
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वाराणसी। जयशंकर प्रसाद सांस्कृतिक जागरण के मनीषी कवि थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, दर्शन, इतिहास की श्रेष्ठ परंपराओं को उन्होंने नई दृष्टि दी। यह बात ख्यात समालोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने बुधवार को कही।
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वह धर्मसंघ शिक्षा मंडल में तीन दिवसीय भारतीय लेखक शिविर और जयशंकर प्रसाद की सृजन यात्रा पर विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन बोल रहे थे। आयोजन बलदेव पीजी कालेज हिंदी विभाग और विद्याश्री न्यास की ओर से किया जा रहा है।
प्रो. प्रधान ने कहा कि प्रसाद ने अपनी रचनाओं में रुढि़यों और सामंती पाखंडों के विरुद्ध स्वर बुलंद किया है। प्रेमचंद, निराला के साथ वह आधुनिक साहित्य की भव्य त्रिमूर्ति का निर्माण करते हैं।
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शिलांग के प्रो. माधवेंद्र पांडेय ने कहा कि प्रेमचंद और प्रसाद मिलकर साहित्य के एक युग का संपूर्ण निर्मित करते हैं। प्रेमचंद वाह्य जीवन की समस्याओं की व्याख्या करते हैं तो प्रसाद आंतरिक जीवन की।
आज से सांस्कृतिक संकट के दौर में प्रसाद सर्वाधिक प्रासंगिक हैं। तृतीय सत्र में अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि प्रसाद जी विश्व दृष्टि संपन्न कवि हैं। उनका कवि उनकी समस्त विधाओं में सर्वोपरि है। उनकी कविताओं में जीवन के सौंदर्य, संघर्ष और ध्येय की खोज है। वे जिस काव्य चेतना की सृष्टि करते हैं उससे समस्त मानवता आलोकित है।
इस तरह प्रसाद मनुष्यता की वृहत्तर चेतना को निरंतर आलोकित करते रहेंगे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि उनकी लंबी कविता प्रलाप की छाया तत्कालीन स्वाधीनता आंदोलन की परिस्थितियों की उपज है। डा. कमल कुमार, डा. जितेंद्र नाथ मिश्र, राजेंद्र प्रसाद पांडेय, प्रो. भारती गोरे, अनंत मिश्र, प्रो. वशिष्ठ अनूप प्रो. माधवेंद्र पांडेय आदि ने विचार व्यक्त किए।
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