दशहरे पर अत्याचार रूपी रावण को जलाकर खुशी मनाने के लिए बच्चे-बड़े सभी घरों से निकलेंगे। बुराई के प्रतीक पुतले तो जल जाएंगे लेकिन हमारे आसपास वर्षों से मुसीबत बने समस्या रूपी रावण उसी तरह अट्टहास करते नजर आएंगे। बनारस बुनियादी विकास, जनोपयोगी सुविधाओं से तब भी बहुत दूर है जब इसे स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल कर लिया गया है। मेट्रो रेल दौड़ाने की तैयारी है। बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने, ऐतिहासिक धरोहरों, स्थलों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए केंद्र-प्रदेश सरकार ने हजारों करोड़ रुपये दिए मगर हालात नहीं सुधर सके हैं। टूटी सड़कें, ध्वस्त सीवेज व्यवस्था, दूषित पेयजल, बेपटरी यातायात, अतिक्रमण, अशिक्षा, कुपोषण और ध्वनि-वायु प्रदूषण रूपी समस्याओं के रावण के मकड़जाल में फंसकर शहर की 35 लाख की आबादी जूझ रही है। आइए, इस बार के दशहरे पर समस्या रूपी रावण का वध करने का संकल्प लें।
सड़कों से लेकर गलियों तक अतिक्रमण से शहर जूझ रहा है। पटरियों पर पुलिस स्टेशन, बिजली के ट्रांसफारमर से लेकर चबूतरे और अस्थाई बाजार मुसीबत के सबब बन गए हैं। अनियोजित विकास के चलते सड़कों और गलियों पर कब्जा कर लिया गया हैं। तालाबों-कुंडों को पाटकर कॉलोनियां बना ली गई हैं।
दूध, तेल, घी, मसाले से काजू तक ऐसा कोई खाद्य पदार्थ नहीं हैं जिसमें मिलावटखोरी न की जा रही हो। रिटेल शॉप हो या फिर ब्रांडेड मिठाई की दूकानें, इससे अछूती नहीं हैं। सौ से ज्यादा खाद्य वस्तुओं के नमूनों में 75 से ज्यादा फेल हो गए हैं। कुछ कारोबारियों पर जुर्माना भी लगा लेकिन बदला कुछ नही।
शहर की सीवेज और ड्रेनेज व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। नई सीवर लाइन बिछाने का काम तकरीब आठ साल पहले शुरू हुआ मगर अब तक काम अधूरा है। न गोइठहां में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन सका न दीनापुर सीवेज प्लांट की क्षमता वृद्धि हो पाई। बारिश में पूरा शहर जलमग्न हो जाता है।
स्मार्ट शहरों की सूची में शामिल अपने शहर में कूड़ा निस्तारण तक की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। गलियों से कॉलोनियों की सड़कों तक रोजाना 600 मीट्रिक टन कूड़ा रोजाना निकलता है। कूड़ा निस्तारण के लिए करसड़ा प्लांट को भी पूरी क्षमता से नहीं चलाया जा सका। शहर गंदगी से बजबजा रहा है।
शहर के कई इलाकों में हवा में पार्टिक्यूलेट मैटर 2.5 माइक्रोग्राम (बारीक धूल कण) की मात्रा सात गुना से भी अधिक पाई गई है। शहर के 239 अस्पतालों के बायोमेडिकल कचरे के के साथ ही 450 एमएलडी से अधिक गंदा पानी गंगा रोज में बहाया जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण के कारण श्रवण शक्ति कमजोर हो रही है।
सब पढ़ें सब बढ़ें, सर्व शिक्षा अभियान हो या मिड डे मील योजना। बच्चों को ये अभियान शिक्षा से पूरी तरह से जोड़ नहीं सके हैं। स्कूलों में शिक्षक नहीं आते, बच्चों के नाम रजिस्टर पर चढ़ाकर योजनाओं के मद में हेरीफेरी की जा रही है। यह वजह है कि ड्राप आउट बच्चों की संख्या में भी कमी नहीं आ रही।
शहर में 36 ऐसे स्थान हैं, जहां रोजाना जाम लगना आम बात है। निजात के लिए ट्रैफिक पुलिस के सहयोगी के तौर पर यातायात मित्रों की तैनाती तो हुई, मगर अवैध पार्किंग, पटरियों पर अतिक्रमण, बगैर परमिट के वाहनों, यातायात नियमों की अनदेखी के कारण जाम की समस्या जस की तस है।