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उमरे से बड़ी इबादत है गरीबों की मदद, सवाब कमाएं

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वाराणसी। रमजान में हर नेकी का सवाब सत्तर गुना है। दूसरा अशरा मगफिरत का शुरू हो चुका है। ऐसे में रोजेदारों के पास नेकी के जरिये हैं जिससे वो अल्लाह की रहमत और मगफिरत हासिल कर सकता है। अब जबकि कोरोना की वबा की वजह से इस साल उमरा, हज, जियारत सब पर पाबंदी है तो इन पर खर्च होने वाली रकम गरीबों की मदद का अहम जरिया बन सकती है और देने वाले अल्लाह की एक अजीम सवाब के हकदार बन सकते हैं।
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अमूमन हर साल रमजान में उमरा करने के लिए देश भर से करीब एक से सवा लाख लोग जाते हैं। रमजान के एक दो दिन पहले मक्का पहुंचते हैं और ईद मनाकर वहां से लौटते हैं।
सैयद फरमान हैदर कहते हैं कि उमरे के लिए एक व्यक्ति पर करीब एक लाख पांच हजार से लेकर सवा लाख तक खर्च होता है। ऐसे में इस बार जिन्होंने उमरे पर जाने की नियत की थी और लॉक डाउन की वजह से नहीं जा पाए हैं वेे इस रकम से अगर रमजान में गरीबों की मदद करें तो हजारों हजार गरीबों का न सिर्फ रोजा बल्कि ईद भी अच्छी हो जाए।
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बाबू हुसैन ट्रेवल्स के मौलाना कैफी बताते हैं कि हर साल बनारस व पूर्वांचल के जिलों से 500 से 600 जायरीन रमजान में उमरा करने जाते हैं। ऐसे में अगर उमरे की रकम से कोरोना की वबा से भुखमरी और मुसीबत झेल रहे लोगों की मदद हो जाए तो वो इंसान अल्लाह के और नजदीक हो जाएगा। वैसे रमजान में हर एक नेकी का सवाब कई गुना है।
मौलाना जमीर कहते हैं कि ये जरूरी नहीं कि इबादत उस पाक सरजमीं पर जाकर की जाए तभी कुबूल होगी। ऐसे में जरूरी है कि पेश इमाम, सरदार व नुमाइंदों के जरिये ऐसे लोगों की भी मदद की जाए तो खुद्दार हैं, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते। इससे अल्लाह की इबादत भी हो जाएगी और यकीनन बहुत सारे लोगों की रमजान में ही ईद हो सकती है।
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