पच्चीस हजार करोड़ रुपये की नमामि गंगे परियोजना लागू होने के बाद भी काशी में गंगा की बदहाली में कोई अंतर नहीं आया है। दावों के विपरीत घाटों पर परेशान कर देने वाली बदइंतजामी देखी जा सकती है।
कहीं कूड़े के ढेर लग रहे हैं तो कहीं उपली पाथी जा रही है। जगह-जगह कपड़े धोने, सुखाने और पशुओं के घूमते रहने से स्वच्छता और निर्मलता की मुहिम पर पानी फिर रहा है।
कहा जा रहा है कि कागज पर योजनाएं बनाने और दिखावे के लिए सफाई अभियान चलाने के अलावा फिलहाल गंगा के लिए यहां कुछ नहीं हो सका है।
गंगा घाटों पर स्वच्छता अभियान को चिढ़ाने वाले दृश्य हर तरफ देखे जा सकते हैं। रविवार की दोपहर करीब दो बजे तक घाटों पर कूड़े के ढेर लगे रहे। पता चला कि किसी घाट पर झाड़ू तक नहीं लगाई गई थी।
मानसरोवर घाट पर एक तरफ विदेशी पर्यटक बैठे रहे तो उनके सामने ही मढ़ी पर उपली सुखाई जाती रही। राजा घाट, पांडेय घाट और चौकी घाट, लाली घाट पर धोबियों ने कब्जा जमा रखा था।
वहां कपड़े धोने के बाद सीढ़ियों पर सुखाने के लिए फैलाए गए थे। पालतू पशुओं के सींग मारने और इधर-उधर गंदगी करने का सिलसिला कई घाटों पर आम रहा।
दूसरी ओर, घाटों पर सीवर के रिसाव से भी हालत बदतर दिखी। घरों, होटलों का गंदा पानी बहकर सीधे घाटों, सीढ़ियों से होते हुए गंगा में जा रहा है।
हालांकि घाटों को साफ-सुथरा रखने के लिए नगर निगम में सामाजिक संस्थाओं की जिम्मेदारी तय की है लेकिन उनके स्वयंसेवकों का भी कहीं अता-पता नहीं है।
गंगोत्री सेवा समिति के मनीष दुबे, दशाश्वमेध के निवासी आशीष पांडेय, संजय गुप्ता ने बताया कि सिर्फ दिखावा के लिए किसी दिन इन संस्थाओं से जुड़े लोग झाड़ू उठा लेते हैं।
इसके बाद उनका पता नहीं चलता। ऐसे में पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र घाट बदहाली के शिकार हो रहे हैं।