दवा पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी हाथ-पैर कांपने की बीमारी ठीक नहीं हुई। ऐसे 50 मरीजों ने बीएचयू के न्यूरोलाजिस्ट डॉ. वीएन मिश्रा की सलाह पर दवा के साथ ही बाकला दाल का सेवन शुरू किया था। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। दाल के सेवन से महीने भर में ही ज्यादातर मरीजों की पचास प्रतिशत से ज्यादा बीमारी ठीक हो गई। इस उपलब्धि से न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर उत्साहित हैं। अब और भी मरीजों को बाकला दाल का सेवन करने की सलाह दी जा रही है।
11 अप्रैल को विश्व पार्किंसन दिवस पर अमर उजाला ने बीएचयू के न्यूरोलाजी विभाग के डॉ. वीएन मिश्रा के बाकला दाल पर किए गए शोध के आधार पर ‘बाकला खाएं, कांपने की बीमारी भगाएं’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। डॉक्टर ने दावा किया था कि बाकला दाल के सेवन से कांपने (पार्किंसन) की बीमारी दूर हो सकती है।
पिछले करीब दो महीनों में डॉक्टर ने कांपने की बीमारी से ग्रसित मरीजों को दवा के साथ-साथ बाकला दाल खाने की सलाह दी। मरीजों को दोबारा 20 से 30 दिन बाद बुलाया गया। सभी मरीजों ने बाकला दाल के सकारात्मक परिणाम बताए। इसमें से कुछ मरीज अमर उजाला की कटिंग लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे।
गाजीपुर जिले के करंडा निवासी विनोद दूबे, बलिया के प्रभुनाथ वर्मा, आजमगढ़ की मोहसिना बेग, यहीं के एबी खान, बिहार के सीवान जिले के भुल्लन, देवरिया जिले के बरहज निवासी इस्माइल का कहना है कि बाकला दाल के सेवन ने उन्हें काफी आराम हुआ है।
यह है पार्किंसन बीमारी
शरीर के किसी एक हिस्से में कंपन शुरू हो जाता है। अमूमन यह हाथ, पैर या गर्दन से शुरू होता है। धीरे-धीरे मसल्स कमजोर होने लगती है। मरीज चलने-फिरने में कमजोरी महसूस करता है।
यूपी, बिहार, असम में मिलती है बाकला
बाकला की पैदावार उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और असम समेत कई राज्यों में होती है। गांवों में बाकला को मसलहिया सेम भी कहते हैं। लोग इसकी सब्जी और हलुआ बनाकर खाते हैं।