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एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे...

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वाराणसी। मां भले ही कोलकाता में रहे या दुनिया के किसी कोने में उनके दिल में बनारस ही बसता था। वह कहा करती थीं कि जिस दिन गाना खत्म हो जाएगा उस दिन मैं नहीं रहूंगी। वह जब भी रियाज करती थीं तो शिष्यों से कहती थीं कि एक दिन फुर्र से उड़ जाऊंगी तब समझोगे। संगीत उनके लिए धर्म और संगीत ही पूजा थी।
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ठुमरी साम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी की इकलौती पुत्री डॉ. सुधा दता ने मां की जयंती (आठ मई) पर उनकी यादें साझा कीं। डॉ. दता ने बताया कि हम लोग मां के शिष्यों के साथ मिल कर हर साल उनका जन्मदिन मनाते थे, लेकिन इस बार कोविड संक्रमण के कारण यह संभव नहीं हो पाएगा। घर से ही मां को नमन करेंगे। मां के लिए एक कविता लिखी थी सोचा था कि जन्मदिन पर सुनाऊंगी, लेकिन क्या पता था कि वह इतनी जल्दी हमें छोड़कर चली जाएंगी। मातश्री तेरा रूप सुंदर, देवी तेरा गीत सुंदर। ताल सुंदर राग सुंदर, गीत का हर भाव सुंदर...को जब 2017 में लिखा था तो मां ने पूछा कि क्या लिख रही हो। मैंने कहा कि आपके लिए सरप्राइज है। उस समय मुझे नहीं पता था कि मैं मां को यह गीत नहीं सुना पाऊंगी। शनिवार को यह गीत उनके शिष्य अपनी गुरु मां को संगीत बद्ध कर समर्पित करेंगे। मां को गुरु शिष्य परंपरा के तहत जो भी मिला था वह अपने शिष्यों को देना चाहती थीं। बहुत सख्त मां थीं, समर्पित शिष्या और गुणी गुरु। मां ने तो दिल खोलकर सीखा और मरते दम तक अपने शिष्यों को सिखाया। 24 अक्तूबर 2017 को उन्होंने अंतिम सांस ली। एक दिन पहले तक वह शिष्यों को सीखा रही थीं। वह काशी में संगीत के लिए बहुत कुछ करना चाहती थीं लेकिन उनकी इच्छा उनके साथ ही चली गई। मां आज नहीं हैं लेकिन उनका प्रेम, उनका संगीत, उनकी ममता हमारे संग रहती है।
जीवन में था अनुशासन
डॉ. दत्ता ने बताया कि उनके जीवन में अनुशासन बहुत था। ऐसा नहीं था कि संगीत के कारण उन्होंने हम लोगों पर ध्यान नहीं दिया। वह पहले अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करती थीं। अपने शिष्यों को भी यही सिखाती थीं कि पहले अपनी जिम्मेदारियों और संबंधों पर ध्यान दें उसके बाद रियाज करें।
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