ट्रेन में सुरक्षा व्यवस्था की पड़ताल करते पुलिस कर्मी
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80 के दशक में पूर्वांचल से लेकर लखनऊ और बिहार के रेलवे के ठेकों को लेकर गोरखपुर से वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई। 90 के दशक में जमकर खूनखराबा हुआ और माफिया गिरोहों के सरगना भी मारे गए। इसके बाद मऊ सदर विधायक मुख्तार अंसारी और उनके करीबी माने जाने वाले मुन्ना बजरंगी के गिरोह से जुड़े ठेकेदारों का रेलवे और डीरेका के ठेकों पर वर्चस्व हो गया।
जुलाई 2018 में बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद मुख्तार अंसारी पंजाब की जेल में शिफ्ट हो गए। माफिया सिंडिकेट के लिए रेलवे और डीरेका के ठेकों में पैठ जमाने का यह अच्छा अवसर था। इसी बीच बीते साल लोकसभा चुनाव से पहले माफिया सिंडिकेट के साथ बनारस, जौनपुर, भदोही, चंदौली और मिर्जापुर के जरायम जगत के अन्य चर्चित नाम भी जुड़ गए।
इसका परिणाम यह हुआ कि मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी के खेमे से जुड़े ठेकेदार अपनी जान की खातिर रेलवे के ठेकों से पीछे हटते गए। एक ठेकेदार ने बताया कि अब स्पष्ट संदेश है कि रेलवे की ठेकेदारी करना है तो माफिया सिंडिकेट की सरपरस्ती में करना है और उनकी मर्जी अनुसार 10 से 20 प्रतिशत तक कमीशन देना है। जो ठेकेदार माफिया सिंडिकेट के हिसाब से काम नहीं करता है उसे तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।