आठ करोड़ की लागत से गंगा-वरुणा संगम पर बन रहा सराय मोहाना पुल किसी काम का नहीं। क्योंकि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी 70 मीटर लंबे इस पुल से न तो एंबुलेंस गुजर सकेगी और न ही कोई तिपहिया या चार पहिया वाहन। ऐसे में सराय मोहाना और उससे जुड़े 50 गांवों के लोगों का सपना टूटने को है।
गांव के लोगों ने जिस पुल के लिए सालों आंदोलन किया, अब उस पुल के बनने से खुश नहीं हैं। पुल के बीचोंबीच तीन फीट का डिवाइडर बनने से पुल इतना संकरा हो गया है कि अब पैदल या दो पहिया वाहन से ही पुल को पार किया जा सकता है। कोई कार या बड़ी गाड़ी नहीं जा सकेगी।
जिला मुख्यालय से महज सात किलोमीटर दूर सराय मोहाना गांव गंगा और वरुणा संगम के दूसरे छोर पर बसा है। उस किनारे सराय मोहाना सहित करीब 50 गांव और हैं। अकेले सराय मोहाना की आबादी आठ हजार है। नदी पर कोई पुल नहीं होने की समस्या से गांववाले सदियों से जूझ रहे हैं। तकरीबन छह महीने बांस बल्ली की पुलिया से गांव की पूरी आबादी शहर को जाती है और इतने ही महीने लोग नाव से नदी पार करते हैं। उस पर जो टैक्स देना होता है सो अलग।
फिलहाल अब तो बांस की पुलिया को भी हटा दिया गया है। शहर से गांव को जोड़ने के लिए गांव वालों ने पक्के पुल के निर्माण के लिए आंदोलन चलाया। सैकड़ोें साल बाद उनकी आवाज सुनी गई। फरवरी 2006 में पुल का निर्माण शुरू हुआ लेकिन वहां एक संस्था द्वारा जमीन पर स्टे ले लिया गया, इससे पुल का काम रुक गया। मामला कोर्ट में पहुंचा।
हाईकोर्ट ने प्रशासन से जनहित में फैसला लेने का आदेश दिया। 2014 में पुल का निर्माण फिर से शुरू हुआ, गांववाले खुश हुए। लेकिन, एक बार फिर से उनकी खुशी को ग्रहण तब लग गया जब उस पुल के बीच तीन-तीन डिवाइडर बनाए जाने लगे। पुल पर तीन डिवाइडर इसलिए बनाया जा रहा है ताकि इस पर कोई तीन पहिया या चार पहिया वाहन न जा सके।