बदहाली और उपेक्षा का दंश झेल रहा गौरी कुंड।
शिवापराधात् पापं किन्मदस्ति जगद्गुरु/तत्रापि काश्यघं श्रेष्ठं दुर्नोद्यं जन्मकोटिभि:/ ताद्यशानाश्च पापानां ध्वंसकंम तीर्थ मुत्तमम्/अहमेव विजानामि तत्तीर्थस्य च वैभवम/पुरा कस्यापि नोक्तं तद् रहस्यं कथितं तव/कलया पंचदशयालिंगे केदारनायक:
श्रीमत परस्मैय निज चित धनाय:/गौरी तप पूर्ण फल प्रदाय:/केदारनाथाय नम: शिवाय:/नमो नम: कारण कारणाय:।
मनसा, वाचा, कर्मणा के किए गए किसी भी तरह के ज्ञात, अज्ञात पापों का ही नहीं कई जन्मों के पापों का शमन केदार घाट पर गौरी कुंड में डुबकी लगाने से होता है। केदार महात्म्य और काशीखंड में इसका उल्लेख है। भगवान शिव के रूप में केदार नाथ को प्राप्त करने के लिए कभी इसी स्थान पर गौरी ने घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या सिद्ध हुई और उन्होंने भगवान को प्राप्त किया। जनश्रुति है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने भी ध्यान लगाया था। इस कुंड पर स्नान और दीपदान के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु काशी आते हैं। पानी न होने से अब यह कुंड सूख चुका है। भक्तों को इस कुंड में पानी भरे जाने की दरकार है, ताकि इसकी महिमा बनी रहे।
काशी में एक कुंड ऐसा भी है, जहां से मुक्ति मार्ग खुलता है। काशी के केदारखंड को पुराणों में मुक्ति का पथ कहा गया है। भगवान शिव ने जब तांडव किया था, तब सती के शरीर के टुकड़े काशी के केदार खंड में जहां गिरे। वहां निर्मल जल की एक धारा प्रस्फुटित हुई थी। उसी को पवित्र गौरी कुंड के नाम से जाना जाता है। गंगा का जलस्तर खिसकने की वजह से केदार घाट स्थित गौरी कुंड सूख चुका है।
काशी में गिनती के तीर्थस्थलों में से एक केदारेश्वर मंदिर भी 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के कहर से बच गया था। इसी स्वयंभू केदारेश्वर मंदिर के पास है गौरी कुंड। भगवान शिव ने जब तांडव किया था, तब मां सती का शरीर इस स्थान पर गिरा था। इसी वजह से पुराणों में इसे जगत का पहला कुंड कहा गया है। भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर काशी में ध्यान लगाया था। यहीं पास में भगवान शिव की रौद्ररूप वाली प्रतिमा भी स्थित है। इसके अलावा एक और मत इस कुंड के बारे में मिलता है। कहते हैं कि मां गौरी ने कभी भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए इसी स्थान पर तप किया था। उनके कठोर तप के दौरान शिव के वियोग में निकली अश्रुधारा ने ही बाद में गौरी कुंड का रूप ले लिया।