हमारी छोरियां किसी से कम नहीं
कोरोना की वजह से जब सबके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा था। ऐसे वक्त में हमारी छोरियां माता-पिता की लाठी बनीं। हम बात कर रहे हैं अभ्युदय संस्था से जुड़कर काशी जूट क्रिएशन में काम करने वाली नेहा व सोनी वर्मा की। विपरीत परिस्थितियों में इन बेटियों ने हार नहीं मानी और अपने हुनर से जूट बैग तैयार कर परिवार को आर्थिक संकट से उबारा। सिलाई-कढ़ाई कर नेहा ने माता-पिता व चार छोटे भाई-बहनों का पेट भरने के लिए आठ से दस घंटे काम करके घर की आर्थिक स्थिति को संभाला। तो वहीं लॉकडाउन में सोनी के पिता की साइकिल रिपेयरिंग का काम पूरी तरह से ठप पड़ गया था। तब सोनी ने पिता की मदद करने की ठानी और संस्था में जाकर जूट उद्योग का काम सीखा। सप्ताह भर की मेहनत के बाद सोनी न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रही है, बल्कि घर की आर्थिक जिम्मेदारी में निभाने में पिता के कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही है। इस उद्योग से जुड़कर उन्हें हर महीने 6 से 7 हजार की आर्थिक मदद मिल रही है।
जरूरतमंद बच्चों के हाथों में आईं किताबें तो खिल उठे चेहरे
कभी रेलवे स्टेशन के किनारे तो कभी किसी मंदिर के प्रांगण में शुरू हुई पाठशाला अब तक कई छात्र-छात्राओं की जिंदगी बदल दी है। स्टेशन पर छूटे हुए बच्चे अपना पेट पालने के लिए बाल मजदूरी करने, कूड़ा-करकट बीनने और भीख मांगने वाले बच्चों के हाथों में आज कॉपी और कलम है। आज वे सपने देख रहे हैं और अपने हौसलों को बुलंद कर रहे हैं। इन बच्चों का ये सपना सच कर रही हैं काशी की दो बेटियां रोमा व रिमझिम। बाल गृह शिशु से जुड़ी ये दोनों बेटियां समाज के उस तबके के बच्चों के सपनों में रंग भर रहीं है जो इसका ककहरा भी नहीं जानते थे। लेकिन आज ये सब कुछ छोड़कर पढ़ाई कर रहे हैं, अपने भविष्य की नींव मजबूत कर रहे हैं। रोमा व रिमझिम सिर्फ बच्चों को पढ़ाती नहीं, बल्कि इन बच्चों का प्राथमिक स्कूलों में दाखिला भी कराती हैं। अब तक इन दोनों ने 30 से ज्यादा बच्चों का दाखिला स्कूल में कराया है।