अंतिम प्रवास स्थल को स्मारक बनने का इंतजार
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राजा पीएन टैगोर की संपत्ति थी गोपाल लाल विला
तीस साल चली कानूनी लड़ाई के बाद पश्चिम बंगाल सरकार को मिले सात लाख
गोपाल लाल विला को स्मारक बनवाने के लिए प्रयास कर रहे नित्यानंद राय एडवोकेट बताते हैं यह राजा पी एन टैगोर की संपत्ति थी, जो बाद में वेस्ट बंगाल एडमिनिस्ट्रेटर जनरल में निहित हो गई। जो मुकदमेबाजी अधिग्रहण के बाद शुरू हुई वो कलेक्टर वाराणसी और एडमिनिस्ट्रेटर जनरल वेस्ट बंगाल के बीच सुप्रीम कोर्ट तक चली। मकान का महत्व इसलिए है कि क्योंकि स्वामी जी अपने निर्वाण से पहले फरवरी 1902 में यहां आए थे।
तीस साल चली कानूनी लड़ाई के बाद संपत्ति की कुल कीमत पश्चिम बंगाल सरकार को सात लाख रुपये मिली थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतना पुराना मकान होते हुए भी गोपाल लाल विला अभी भी बहुत मजबूत और उपयोगी है। गोपाल लाल विला आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। कभी यह 25 हजार स्क्वायर फीट क्षेत्रफल में फैला हुआ था। इसमें 35 कमरे और हाल था। मकान में फर्श मार्बल के और दरवाजे व खिड़कियां वर्मा टीम के बने हुए थे। 23.66 एकड़ जमीन में 431 फल के पौधे, 13 लकड़ी के पौधे, 12 बांस के झुरमुट थे। संयोग की बात है कि प्रदेश सरकार ने इस जमीन को शिक्षा विभाग के लिए अधिगृहीत करने के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया था वह तारीख चार जुलाई थी। यानी स्वामी विवेकानंद के निर्वाण की तिथि चार जुलाई 1959 को जमीन अधिग्रहीत की गई। टैगोर नगर भी गोपाल लाल विला का ही भाग है और कभी एक ही चहारदीवारी से घिरी थी।