स्वामी को चप्पल देने पर उन्होंने पहनने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि काशी उनके लिए स्वर्ग की नगरी है और यहां वह चप्पल नहीं पहन सकते। इसके बाद वह नंगे पैर ही आगे बढ़ गए।
बातचीत के दौरान उन्हें न्यास के साथ रहकर सेवा कार्य में सहयोग करने और इसके बदले 10 हजार रुपये प्रतिमाह देने का प्रस्ताव दिया गया। इस पर स्वामी ने बताया कि यदि उन्हें नौकरी ही करनी होती तो अमेरिका की नौकरी छोड़कर काशी क्यों आते। उन्होंने कहा कि उनके पास 30 एकड़ जमीन और दो बड़े मकान हैं, जिन्हें छोड़कर उन्होंने काशी को चुना है। स्वास्थ्य ठीक होने के बाद वह बिना किसी पारिश्रमिक के सेवा करना चाहते हैं।
स्वामी की बात सुनकर सेवा न्यास से जुड़े लोग भावुक हो गए। उनका कहना है कि भौतिक सुविधाओं के दौर में त्याग और सेवा की ऐसी भावना काशी की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत करती है।