वाराणसी। रामचरित पर आधारित संस्कृत, हिंदी और अन्यान्य लोक भाषाओं के हजारों काव्य ग्रंथाें में ही नहीं विश्ववांग्मय में भी गोस्वामी तुलसीदास और उनका रामचरितमानस अद्वितीय हैं। काशी ने तुलसी साहित्य के प्रचार प्रसार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। भारतीय धर्म और संस्कृति के संरक्षण में एक समय जो भूमिका जगदगुरु शंकराचार्य ने निभाई थी वहीं भूमिका मध्यकाल में तुलसीदास ने निभाई। उक्त विचार प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी ने व्यक्त किए। वह बुधवार को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर नागरी प्रचारिणी सभा में आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
प्रो. अर्जुन तिवारी ने कहा कि विभिन्न धाराओं के बीच तुलसीदास ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण का जो कार्य किया वह आज भी प्रासंगिक है। प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि गोस्वामी जी ने लोकजीवन की धड़कन को जितनी गहराई के साथ काव्य का विषय बनाया वह अद्भुत है। डॉ. रामअवतार पांडेय ने कहा कि आज हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम मानस का पाठ करते हैं किंतु उसको जीवन में उतारने का प्रयास नहीं करते हैं। डॉ. विजयेंद्र नाथ मिश्र ने मंगलाचरण पाठ किया। सभाजीत शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत किया। इस दौरान डॉ. पवन कुमार शास्त्री, वासुदेव ओबेराय, नरोत्तम शिल्पी, ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी, सिद्धनाथ शर्मा, सूर्यप्रकाश मिश्र, दीपेश चौधरी, जयशंकर जय, डॉ. सर्वजीत सिंह, शुभजीत साहा और सूरजमणि ने विचार व्यक्त किए। ब्रजेश चंद्र पांडेय ने धन्यवाद और संचालन डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र ने किया।