शिवलिंग पर नाग, पुरुष और प्रकृति तथा शिव-शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। काशी के ललिता घाट और पंचकोशी क्षेत्र में चार नागयुक्त शिवलिंग मौजूद हैं, लेकिन अरघे के नीचे नाग की आकृति वाला ऐसा शिवलिंग काशी में दूसरा कहीं नहीं दिखा। संभव है जिसने इसे बनाया होगा उसने इसे अलग आकृति दी हो।
-प्रो. मारूतिनंदन प्रसाद तिवारी, वरिष्ठ इतिहासकार, मूर्तिकला और स्थापत्यविद्, पूर्व विभागाध्यक्ष, बीएचयू
प्रदक्षिणा और तीर्थ यात्रा के अभियान के तहत काशी के लगभग सभी पौराणिक मंदिरों के 30 से ज्यादा बार भ्रमण किया है पर चार नागों की ऐसी आकृति वाला शिवलिंग कहीं नहीं दिखा। यह शिवलिंग वाकई अनूठा है।
-उमाशंकर गुप्ता, संचालक, काशी प्रदक्षिणा समिति
शिवलिंग पर कहां-कहां बनी है चार की आकृति
- पहला नाग- डोमरी में गंगा से मिले शिवलिंग के अरघे के नीचे घेरकर एक बड़ा नाग है। जिसका फन अरघे के अगले भाग के ठीक नीचे है।
- दूसरा नाग- अरघे के अगले भाग में बना हुआ है। यह नाग भी सीधा नहीं बल्कि बीच से घूमा है।
- तीसरा नाग- शिवलिंग के ठीक नीचे लिपटा हुआ है और उसका फन अरघे की तरफ है।
- चौथा नाग- शिवलिंग के ऊपर है यानी अरघे के अग्र भाग की विपरीत दिशा में है। यह नाग सबसे छोटा है।
चार सर्प चार वेद, चार पुरुषार्थ के प्रतीक
काशी के संस्कृति एवं भूगोल के विशेषज्ञ प्रो. राणा पी.बी. सिंह ने बताया कि शिवलिंग पर 4 फन वाले सर्प का अंकन बहुत ही शुभ और गहरा आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह केवल एक सजावट नहीं, बल्कि सनातन धर्म में गहरी ऊर्जा और प्रतीकों का प्रतिनिधित्व है। चार वेदों का प्रतीक हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग के चारों ओर लिपटे या फन फैलाए हुए 4 सर्प चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का प्रतीक माने जाते हैं। 4 सर्प मानव जीवन के चार लक्ष्यों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दर्शाते हैं।