अभियोजन पक्ष के अनुसार, तत्कालीन कैंट एसएचओ सोहन लाल तोमर ने घटनास्थल से .315 बोर का एक खोखा, 12 बोर के दो खोखे, नाइन एमएम के 16 खोखे समेत कुल 19 कारतूस बरामद किए थे। हमले में धनंजय सिंह की सफारी गाड़ी पर कई गोलियों के निशान पाए गए—शीशे पर तीन, बोनट पर चार, बाईं ओर दो और छत पर एक निशान मिला था।
हमले में धनंजय सिंह के हाथ में दो गोलियां लगी थीं, जबकि उनके गनर वासुदेव पांडेय, ड्राइवर दिनेश गुप्ता, संतोष सिंह और जितेंद्र बहादुर सिंह घायल हो गए थे। बचाव में गनर वासुदेव पांडेय ने कार्बाइन से 49 राउंड फायरिंग की थी।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की दलीलों और सात गवाहों की गवाही ने मामले का रुख बदल दिया। साक्ष्यों की कमी और गवाहों के बयानों के आधार पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। हालांकि, इस फैसले के बाद यह प्रश्न अनुत्तरित रह गया है कि उस दिन हुई गोलीबारी के पीछे असली हमलावर कौन थे। यह मामला अब भी रहस्य बना हुआ है, जिस पर कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा जारी है।