मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों जैसी ही उनके गांव की कहानी। यहां तक पहुंचने का रास्ता ऊबड़-खाबड़ है। बरसात के दिनों में ये राह और मुश्किल हो जाती है। जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर वाराणसी-आजमगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पांडेयपुर चौराहे से करीब पांच किलोमीटर का यह रास्ता पूरा होने पर जैसे ही गोदान के होरी-धनिया, पूस की रात के हलकू जैसे किरदारों के जनक मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही का प्रवेश द्वार आता है, उनकी छाप महसूस होने लगती है।
गांव सुंदर और बिजली-सड़क जैसी सुविधाओं वाला है लेकिन लमही का अपना दर्द भी है। सियासत रूपी साहूकार ने लमही बने किसान को जकड़ रखा है। यानी लमही को अपने ‘नायक’ का इंतजार अब भी है। हालांकि उपन्यास सम्राट मुंशीजी की 31 जुलाई को मनाई जाने वाले जयंती समारोह के लिए जोर-शोर से तैयारी की जा रही है। नुक्कड़ नाटक, गीत, कठपुतलियां सजाई जा रही हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए रामलीला मैदान को इंटरलॉक किया जा रहा है।
मुंशी प्रेमचंद के पैतृक आवास के ठीक सामने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास, कहानियों और किरदारों पर शोध करने के लिए मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसर्च सेंटर की बिल्डिंग बने डेढ़ साल हो चुका है पर केंद्र-राज्य सरकार के बीच उद्घाटन कौन करे को लेकर दांव-पेच चल रहा है। यही नहीं, 11 साल पहले मुंशी प्रेमचंद की 125वीं जयंती पर उनके पैतृक आवास को संग्रहालय बनाने की घोषणा की गई थी लेकिन संग्रहालय तो दूर, जहां मुंशीजी ने यहां कफन, निर्मला और ईदगाह जैसी रचनाएं लिखीं, उसकी दीवारों पर दीमक लग गई है। मरम्मत की मद में करीब नौ लाख रुपये खर्च किए जाने के बावजूद दीवारों की सीलन खत्म नहीं हुई है।
साहित्य प्रेमियों को उस दिन का इंतजार है, जब उनके पैतृक आवास की दीवारों पर शीशे में मढ़े मुंशीजी की अनमोल थातियां सहेजी जाएंगी। फिलहाल, इस वक्त ये सब बीएचयू के भारत कला भवन की शान हैं। यही नहीं, अगल-बगल के गांवों से मुंशीजी का ये गांव भले ही देखने सुनने में समृद्ध हो लेकिन गांव के ई-विलेज बनने का सपना अधूरा है। 2014 में गांव को ई-विलेज बनाने के लिए चुना गया था। कंप्यूटर भी आ गए लेकिन दो साल बाद भी इसे इंटरनेट नहीं जोड़ा जा सका है।