फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

घंटियों की रुनझुन बताती है ‘इमाम हुसैन के कासिद’ की आमद

विज्ञापन
विज्ञापन
अशफाक सिद्दीकी
विज्ञापन

वाराणसी। मुहर्रम की सात से 10वीं तारीख तक बनारस की गलियाें में इमाम हुसैन के कासिद की धूम रहती है। कासिद यानी संदेशवाहक। इन कासिदों की कमर में बंधी घंटियां दौड़ते समय रुनझुन की आवाज करती है। जिससे लोग समझ जाते हैं कि इमाम हुसैन के कासिद आमद कर रहे हैं। लेकिन इस बार इन कासिद की घंटियों की रुनझुन कोरोना संक्रमण में दब कर रह गई।
बनारस में इस परंपरा की शुरुआत राजापुरा निवासी स्वर्गीय ताज मुहम्मद ने 1961 में की थी। 2009 में ताज मुहम्मद का इंतकाल होने के बाद 59 साल से यह परंपरा उनके परिवार के सात वारिसों में से एक अब्दुस्सलाम आज भी निभा रहे हैं। अब्दुस्सलाम बताते हैं कि कासिद बनने के लिए लोग मन्नत मांगते हैं। यह मन्नत सिर्फ शारीरिक और मानसिक बीमारी को लेकर होती है। मौजूदा समय में पूरे शहर में निकलने वाले करीब 600 कासिद हैं। जो मुहर्रम की सातवीं तारीख को खलीफा की फातिहा के बाद ‘या हुसैन’ का नारा बुलंद करते हुए निकलते हैं और लगातार तीन दिनों तक नंगे पांव ‘या हुसैन’ का नारा बुलंद करते हुए दौड़ते हैं। रास्ते में घर-घर लोगों के यहां फातिहा करते हैँ और फिर आगे के लिए रवाना हो जाते हैं। 10वीं मुहर्रम की भोर में दोषीपुरा से जुलूस की शक्ल में यह सदर इमामबाड़ा सरैया पहुंचते हैं। जहां इनकी मन्नत पूरी हो जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

बकौल अब्दुस्सलाम, इस बार कोरोना के चलते परंपरा नहीं निभाई जा सकी। लेकिन सातवीं मुहर्रम को खलीफा की फातिहा की गई और नौवीं तारीख तक घर-घर फातिहा होगी जिसमें तीन चार लोग ही शामिल हो रहे। जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह पालन किया जा रहा। पाबंदी के चलते 10वीं मुहर्रम को दोषीपुरा से निकलने वाला जुलूस नहीं निकाला जाएगा। ताज मुहम्मद के वारिस बताते हैं कि कर्बला की जंग में इन कासिदों का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संदेशवाहक इमाम हुसैन के संदेश एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम करते थे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें