सीईओ का काम मंदिर के संचालन और प्रबंधन का है, देवताओं के राग-भोग का फैसला लेना नहीं। आईएएस और पीसीएस मंदिर में व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन देखें। लोगों का भोजन पानी देखें। लेकिन, मंदिर में देवता कब जागेंगे और कब सोएंगे, क्या पहनाया जाएगा, क्या राग-भोग लगाया जाए, ये प्रशासन तय नहीं करेगा। ये बातें सोमवार को बीएचयू के पं. दीनदयाल शोध पीठ के कार्यक्रम के बाद अयोध्या के हनुमतपीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने पत्रकारों से बातचीत में कहीं।
अयोध्या के राम मंदिर की धार्मिक समिति के सदस्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी ने आगे कहा, राम मंदिर में क्या भोग लगेगा ये प्रशासन कैसे तय करेगा? मैं प्रशासनिक व्यवस्था का विरोधी नहीं। लेकिन ये तय हो जाए कि मंदिर व्यवस्था में सीईओ और आचार्य क्या करेगा। सीईओ आचार्य शास्त्र और उपासना पद्धति नहीं समझते। मैं राम मंदिर का हर हाल में समर्थक हूं। उसकी व्यवस्था ठीक करने के लिए जो भी होगा किया जाएगा।
सीईओ आस्था के लिए प्रतिबद्ध, यह कहना बहुत कठिन
आचार्य मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि मंदिर संचालन में आस्था और व्यवस्था दो आयाम हैं। आस्था से मंदिर बनता है और व्यवस्था से आना-जाना, उठना-बैठना और व्यवस्थाओं का संचालन और इसकी जिम्मेदारी सीईओ की हो सकती है। सीईओ मंदिर की आस्था के प्रति प्रतिबद्ध होगा ये कहना बहुत कठिन है। क्योंकि, हमारी प्रशासनिक संरचना मठों की सामाजिक निर्माण की पद्धति को तैयार करने के लिए नहीं है।
विश्वनाथ मंदिर में उठा था असंतोष का स्वर
आचार्य ने कहा कि सीईओ मंदिर की व्यवस्था और आय-व्यय का प्रबंधन कर सकते हैं। वे शास्त्र, देवताओं की उपासना की पद्धति को न तो समझते हैं और न तो उसको व्यवस्थित करने के विषय में कोई निर्णय ले सकते हैं। श्री काशी विश्वनाथ में भी कई प्रकार के असंतोष और आंदोलन सामने आ चुके हैं। मंदिर परंपरा के प्रसंग सभी के सामने आए हैं। इसे पूरी काशी और पूरे देश ने देखा। सीईओ व्यवस्था नहीं बनाएगा तो भी मंदिरों का बेहतर ढंग से प्रबंधन हो सकता है। मंदिर का प्रबंधन सीईओ करें।