राकेश की तस्वीर दिखाती उसकी भाभी
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यूपी के मिर्जापुर में बिरोही निवासी राकेश सिंह कारगिल युद्ध के एक साल बाद दुश्मनों की गोली से शहीद हो गए थे। उस दौरान केंद्र सरकार ने पेट्रोल पंप और प्रदेश सरकार ने पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद उनके परिवार को देने की घोषणा की गई थी लेकिन कोई मदद नहीं मिली।
लद्दाख में तैनाती के दौरान 23 नवंबर 2000 को राजपूत रेजीमेंट के जवान राकेश सिंह दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उस वक्त उनकी उम्र महज 20 साल थी। वह अविवाहित थे। शहीद होने के दो साल पहले वह सेना में भर्ती हुए थे। राकेश के शहीद होने के बाद केंद्र सरकार ने दस लाख रुपये की आर्थिक मदद की।
मिर्जापुर की तत्कालीन सांसद फूलन देवी के प्रयास से पेट्रोल पंप की फाइल लखनऊ से लेकर दिल्ली तक दौड़ती रही लेकिन पेट्रोल पंप नहीं मिला। राकेश सिंह के भाई ओंकेश सिंह बताते हैँ कि प्रदेश सरकार ने पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद का आश्वासन दिया था लेकिन कोई मदद नहीं मिली। फूलन देवी अक्सर उनके घर आती थीं। अगर उनकी मौत न हुई होती तो शायद पेट्रोल पंप मिल गया होता।
राकेश से बड़े भाई राजेश और छोटे भाई ओंकेश बेरोजगार हैं और घर पर खेती करते हैं। खेती के भरोसे ही पूरा परिवार है। राकेश सिंह के शहीद होने बाद 2010 में छह महीने के अंतराल पर पिता राज बहादुर और माता कृष्णावती का देहांत हो गया।
ओंकेश एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे लेकिन परिवार की हालत देख उन्हें नौकरी छोड़कर घर लौटना पड़ा। राकेश सिंह के शहीद होने के बाद तत्कालीन जिला प्रशासन और जन प्रतिनिधियों ने गांव में शहीद राकेश सिंह के नाम से गेट बनाया था लेकिन उसका उद्घाटन आज तक नहीं हुआ। ओंकेश सिंह ने बताया कि कई बार उद्घाटन की तारीख पड़ी लेकिन हर बार वह टलती गई।
शहीद राकेश सिंह की बीमार मां कृष्णावती को देखने भाजपा नेता वरुण गांधी 2010 में उनके घर गए थे। उन्होंने कृष्णावती के इलाज के लिए एक लाख रुपये की मदद का वादा किया था लेकिन उसमें से बीस हजार रुपये ही मिले।