परे भूमि नहिं उठत उठाए, भर करि कृपा सिंधु उर लाए...। संत तुलसीदासजी की यह चौपाई नाटी इमली के ऐतिहासिक मैदान में शुक्रवार की शाम भरत मिलाप की लीला के क्षणों में साकार हुई। चौदह साल बाद अयोध्या पहुंचे राम-लक्ष्मण ने विमान से उतर कर भूमि पर साष्टांग पड़े भरत-शत्रुघ्न को जब दौड़कर गले लगाया तब नेह के आंसू बरस पड़े।
अस्ताचलगामी सूर्य की स्वर्णिम आभा भी और दमक उठी। एक तरफ हाथियों के शाही लाव-लश्कर के साथ हाथ जोड़े कुंवर अनंत नारायण सिंह तो दूसरी ओर छतों, बारजों, सड़कों, गलियों से लेकर लीला स्थल तक खचाखच उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब मिलन की उस बेला का साक्षी बना। चारो भाइयों के मिलते ही हर हर महादेव और सियावर रामचंद्र की जय के उद्घोष के बीच गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा होने लगी और जनसैलाब प्रेम, भक्ति, करुणा की त्रिवेणी में तब्दील हो गया।
काशी के लक्खा मेलों में एक नाटी इमली के भरत मिलाप की पारंपरिक छटा देखने के लिए दोपहर बाद तीन बजे तक सड़कें पैक हो गईं। व्यास परिवार के अलावा लीला में शामिल लोग भी पारंपरिक लाल पगड़ी और साफा बांधे नजर आए। लंका जीतकर अयोध्या में राम की वापसी की खबर लेकर सबसे पहले विभीषण और हनुमान बाजे-गाजे के साथ रथ से नाटी इमली पहुंचे।
यहां रथ से उतकर हनुमान अयोध्यावासियों को सूचना देने निकल गए। तबतक नाटी इमली पुलिस चौकी की छत से लेकर आसपास के भवनों के छतों, बारजों पर लोग इस तरह उमड़े कि कहीं खड़े होने की जगह नहीं बची। 3:45 बजे भगवान का विमान कंधे पर उठाए यादव बंधु जब आए तब एक तरफ बैंडबाजे पर रघुपति राघव राजाराम की धुन गूंजने लगी और दूसरी ओर कीर्तन मंडली ने मृदंग-झांझ पर भरत मिलाप के प्रसंग को स्वर देना शुरू किया।
वानरी सेना मिलन मंच के उत्तरी छोर पर बने अपने आसन पर मुखौटा लगाए विराजमान हो गई। एक के बाद एक दृश्य आता गया और भीड़ उत्साहित होकर जयकारा लगाते हुए अलग-अलग भावों पर अपनी अभिव्यक्ति प्रगट करती रही। 4:20 बजे चार हाथियों के शाही लाव-लश्कर के साथ कुंवर अनंत नारायण सिंह जब आए तब एक बार फिर हर हर महादेव के जयघोष से लीला स्थल गुंजायमान हो उठा।
सबसे आगे लाल साफा बांधे हाथों में ध्वज और भाला लिए पीएसी के जवानों की टुकडी चल रही थी। तीन हाथियों पर सवार राज परिवार के सदस्यों का बेड़ा दक्षिणी तरफ खड़ा हो गया और चांदी के हौदे वाले सुसज्जित हाथी पर सवार कुंवर अनंत नारायण सिंह सीधे राम के विमान के पास पहुंचे। उन्होंने चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक बालमुकुंद उपाध्याय को सोने की गिन्नी भेंट करने के बाद विमान की परिक्रमा की और फिर अपने बेड़े के पास आकर हाथ जोड़कर अभिवादन की मुद्रा में लीला देखने लगे।
4:35 बजे भरत-शत्रुघ्न लीला मंच पर करबद्ध खड़े हुए और ढोल-तासे के साथ नगाड़े गूंजने लगे। चंवर डुलाया जाने लगा। 4:40 पर दोनों भाई साष्टांग लेटकर राम-लक्ष्मण के आने की घड़ियां गिनने लगे। 4:45 पर ढलते सूर्य की स्वर्णिम रश्मियों के बीच तपस्वी वेश में राम-लक्ष्मण कमर में लुटिया और कंधे पर धनुष-बाण लटकाए हुए दौड़े तो प्रभु के दर्शन के लिए आतुर सैलाब खुशियों में डूब गया।
राम-लक्ष्मण ने भरत-शत्रुघ्न को जमीन से उठाकर गले से चिपका लिया और गुलाब की पंखुड़ियां बरसने लगीं। इसके बाद चारों भाइयों को कंधे पर लेकर दौड़ते हुए जब विमान पर ले जाया जाने लगा तब रोमांचकारी भाव ने हर किसी को विह्वल कर दिया। फिर राम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, जामवंत और हनुमान की सवारी वाले विमान को पारंपरिक वेश में यादव बंधुओं की सेना ने कंधे पर उठाया और अयोध्या के मैदान के लिए चल पड़े।