वाराणसी। आधुनिकता काल का सूचक नहीं, एक मूल्यपरक शब्द है। केवल भौैतिक समृद्धि को ही आधुनिकता नहीं समझना चाहिए। ये बातें मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र बीएचयू में स्थापित मालवीय चेयर के आचार्य व साहित्यकार प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहीं। विश्वविद्यालय के ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट सेंटर में मंगलवार को ‘आधुनिकता की अवधारणा और पंडित मदन मोहन मालवीय की ज्ञान दृष्टि’ पर चर्चा करते हुए प्रो. अग्रवाल ने कहा कि महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने औपनिवेशिक दौर में देश की सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह उनकी दूरदृष्टि का परिचायक है कि उन्होंने एक ही परिसर में प्राचीन ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा की व्यवस्था की।
व्यापार की अवधारणा और उसके आयामों को समझे बिना हम आधुनिकता को नहीं समझ सकते। आधुनिकता का सबसे बड़ा लक्षण मनुष्य, समाज और प्रकृति के संबंध को पुनर्परिभाषित करना है। महामना इस बात को ठीक से समझते हैं, इसलिए उन्होंने ज्ञान और शिक्षा की आधुनिक दृष्टि वाला यह विश्वविद्यालय स्थापित किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1941 में छात्रों को संबोधित करते हुए महामना ने कहा था कि हिंदू राज्य या मुस्लिम राज्य की अवधारणा पर जोर न देकर हमें भारतीय राज्य की अवधारणा पर बल देना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. राजीव संगल ने कहा कि मानव का इतिहास मानव की जागृति का इतिहास है। इस पर और गहन शोध की जरूरत है। अध्यक्षता कर रहे प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भारत की खोज यात्रा में पथिकों के लिए मालवीय जी एक विशिष्ट आलोक स्तंभ हैं। विषय प्रस्थापना प्रो. कमलशील ने की। स्वागत केंद्र के निदेशक प्रो. आनंदवर्धन शर्मा, संचालन प्रो. राजकुमार और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने किया।