भगवान शंकर की घोर उपासना में लीन हो गए। बालक मार्कंडेय के जैसे ही 12 वर्ष पूरे हुए तो यमराज उन्हें लेने आ गए। बालक मार्कंडेय भी उस वक्त भगवान शिव की अराधना में लीन थे। उनके प्राण हरने के लिए जैसे ही यमराज आगे बढ़े तभी भगवान शिव प्रकट हो गए।
भगवान शिव के साक्षात प्रकट होते ही यमराज को अपने पांव वापस लेने पड़े। उन्होंने कहा कि मेरा भक्त सदैव अमर रहेगा, मुझसे पहले उसकी पूजा की जाएगी। तभी से उस जगह पर मार्कंडेय जी व महादेव जी की पूजा की जाने लगी। तभी से यह स्थल मार्कंडेय महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
शंकर भगवान के मंदिर में ही दिवार में मार्कंडेय महादेव की पूजा होने लगी। लोगों का ऐसा मानना है कि सावन मास और महाशिवरात्रि में यहां राम नाम लिखा बेलपत्र व एक लोटा जल चढ़ाने से ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।