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उपलब्धि: ‘दे घुमा के’ से मिली पहचान, अब आजमगढ़ की मिट्टी से निकली लेखनी ने मुंबई में जीता फिल्मफेयर

Fri, 04 Sep 2026 05:40 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।

सार

आजमगढ़ जिले के मनोज यादव को ‘दे घुमा के’ से पहचान मिली। इसके साथ ही उन्होंने पीकू, गब्बर, सन ऑफ सरदार समेत कई फिल्मों में गीत लिखे। उन्होंने बताया कि हिंदी हो या मराठी गीत सब में आजमगढ़िया टच देता हूं। अपने जिले की माटी नहीं भूल सकता।
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मनोज यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आजमगढ़ जिले के सगड़ी तहसील क्षेत्र के भरौली गांव की मिट्टी से निकले मनोज यादव ने अपनी लेखनी के दम पर मायानगरी मुंबई में अलग पहचान बनाई है। गीतकार और लेखक मनोज यादव को छह अगस्त को मुंबई के सहारा स्टार होटल में आयोजित फिल्मफेयर अवॉर्ड्स मराठी-2026 समारोह में ‘आता थंबायचा नाय!’ के टाइटल ट्रैक के लिए सर्वश्रेष्ठ गीत (बेस्ट लिरिक्स) का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। फिल्मफेयर की आधिकारिक सूची में भी मनोज यादव को इस श्रेणी का विजेता घोषित किया गया है।

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मनोज यादव की सफलता का सफर संघर्षों से भरा रहा। उनके पिता 1960 के दशक में आजमगढ़ से मुंबई गए और एक मिल में काम किया। मनोज का बचपन मुंबई और गांव के बीच बीता। पढ़ाई मुंबई में होती तो गर्मी की छुट्टियां गांव में बिताते थे। इसी माहौल ने उनकी भाषा और लेखन को जमीन से जोड़े रखा।

मनोज यादव ने बताया कि वर्ष 2005 में उन्होंने मुंबई में फिल्म और विज्ञापन जगत में कदम रखा। शुरुआत विज्ञापन जिंगल लिखने से हुई। धीरे-धीरे फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिला और उनकी पहचान मजबूत होती गई। वर्ष 2011 के क्रिकेट विश्वकप का आधिकारिक गीत ‘दे घुमा के’ उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल है।
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इस गीत पर भारत के दिग्गज क्रिकेटर गौतम गंभीर और युवराज सिंह ने उन्हें ट्विट कर बधाई दी और कहा कि उनका लिखा यह गाना जब स्टेडियम में बजता था तो उनका उत्साह बढ़ता था। इसके बाद उन्होंने सन ऑफ सरदार, पीकू, गब्बर इज बैक, निल बटे सन्नाटा, अंगुली, अज़हर, बदला और तरला समेत कई फिल्मों के लिए गीत लिखे।

मराठी सिनेमा में बनाई पहचान
मराठी सिनेमा में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वेंटिलेटर के ‘बाबा’, पाणी के ‘नाचणारा’ और आता थंबायचा नाय! के गीतों ने उन्हें सम्मान दिलाया। ‘नाचणारा’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर मराठी में नामांकन भी मिला था।

‘आता थंबायचा नाय!’ की कहानी सफाई कर्मचारियों और समाज के वंचित तबके के संघर्ष पर आधारित है। फिल्म के शीर्षक गीत में संघर्ष से निकलकर आगे बढ़ने और अपना भाग्य खुद बनाने का संदेश है। इसी गीत ने मनोज यादव को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया। पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने इसे अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए कहा कि इस खुशी के पल में उन्हें अपने माता-पिता की याद आई। मनोज यादव गीतकार के साथ लेखक और संवाद लेखक भी हैं। फिल्म ‘ठाकरे’ के हिंदी संवाद और गीत लेखन से भी वह जुड़े रहे हैं।
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जिस क्षेत्र में जाओ पूरी तैयारी और खुद पर भरोसे के साथ
अमर उजाला से खास बातचीत में मनोज यादव ने कहा कि आज मैं जो भी गाना लिखता हूं उसमें आजमगढि़या टच जरूर देता हूं। क्योंकि, मैं अपनी माटी को नहीं भूल सकता हूं। मेरी सबको यही सलाह है कि कहीं भी रहिए चाहे जितनी भी सफलता हासिल कर लीजिए लेकिन अपनी माटी को मत भूलिए। साथ ही जिस फील्ड में आप जा रहे हैं उसके बारे में पूरी तैयारी करके जाएं ताकि आपको सफलता मिल सके। क्योंकि, अधूरा ज्ञान हमेशा से हानिकारक होता है।
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