काशी विद्यापीठ का प्रारंभ भदैनी में किराये के मकान में हुआ। भदैनी के बाद विद्यापीठ कर्णघंटा स्थित धर्मशाला में स्थानांतरित की गई। चकला बाग में जमीन खरीदी गई। इस पर भवन निर्माण में यह ध्यान रखा गया कि ऐसे कमरे बनें, जिसमें दिन में पढ़ाई हो और रात में शयनगार के लिए उपयोग हो।
संस्थापक शिव प्रसाद गुप्त की इच्छा थी कि भवन मात्र तीन-चार घंटे नहीं बल्कि दिन रात उपयोग में आएं। कमरों में अलमारियां लगाई गईं। जिसमें विद्यार्थी अपना बिस्तर आदि समेट कर रखें और दिन में पढ़ाई हो सके। विद्यापीठ में छात्रावास, औषधि एवं शिक्षा नि:शुल्क थी।
शिक्षा की योजना पर हुआ विचार
चौरीचौरा कांड से विचलित गांधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। इसके बाद शिक्षा की योजना पर विचार का निश्चय किया गया। 1923 में वाराणसी में राष्ट्रीय शिक्षा पर कांफ्रेंस बुलाई गई। इसमें विद्यापीठों के प्रतिनिधि, धर्माचार्य, शांति निकेतन, गुरुकुल कांगड़ी, बंगाल की राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, महिला विश्वविद्यालय पूना सहित 24 संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसका उद्घाटन डॉ. भगवान दास ने किया। 10 दिनों तक चली कांफ्रेंस में 20 सत्र हुए।
महात्मा गांधी की धरोहर है विद्यापीठ
काशी विद्यापीठ स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धरोहर है। इनका रक्षा और विकास एक राष्ट्रीय दायित्व है। आजादी के इस पवित्र मंदिर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ सहित सभी विद्यापीठों को राष्ट्रीय आंदोलन का स्मारक घोषित किया जाना चाहिए। इन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का संग्रहालय बनना चाहिए। प्रतिदिन लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से आजादी का इतिहास पर्यटकों को दिखाया जाना चाहिए। - प्रो. ओमप्रकाश सिंह, निदेशक, महामना मालवीय पत्रकारिता संस्थान एवं पर्यटन अध्ययन संस्थान, काशी विद्यापीठ।