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महाशिवरात्रि 2026: नवग्रहों के काष्ठ पट्ट पर विराजेंगे शिव-गौरा, भक्तों को देंगे दर्शन; भव्य होंगे आयोजन

Wed, 11 Feb 2026 11:00 AM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी में महाशिवरात्रि को लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस दिन शिव-गौरा नवग्रहों के काष्ठ पट्ट पर विराजेंगे। इसके लिए पांच राज्यों से लाई गई लकड़ियों से काष्ठ पट्ट बना है। 
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शिव और गौरा का विग्रह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि पर धार्मिक उत्सव के साथ सदियों पुरानी लोक परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक चेतना का संगम दिखेगा। इस बार काशीपुराधीश्वर भगवान विश्वनाथ और माता गौरा नवग्रहों से सहित 11 प्रकार की पवित्र लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठ पट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे। पांच राज्यों से लाई गई लकड़ियों से काष्ठ पट्ट बना है।

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महाशिवरात्रि से पहले 13 फरवरी को हल्दी और शगुन के लोकाचार निभाए जाएंगे। जबकि महाशिवरात्रि के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का विशेष शृंगार, पूजन और विवाह के लोकाचार की रस्म पूरी की जाएगी। नवग्रहों की लकड़ियों से बने काष्ठ पट्ट पर बाबा और माता गौरा विराजमान होंगे। हल्दी की रस्म में काष्ठ पट्ट का भी प्रयोग होगा। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर इन आयोजनों की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। परंपरानुसार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाएं विधि-विधान से काष्ठपट्ट पर विराजमान कर मांगलिक अनुष्ठान कराए जाएंगे।

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आयोजक वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काष्ठपट्ट का निर्माण नवग्रहों के पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से होता है। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का इस्तेमाल ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोक कल्याण का प्रतीक होता है। शिवांजलि के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि काशी की परंपरा में बाबा विश्वनाथ के हर लोकाचार में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा संबंध है। प्रकृति, देवता और मानव जीवन एक दूसरे से जुड़े हैं। शिवभक्तों के लिए यह क्षण दुर्लभ और अलौकिक होगा।

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मदार, गुलर व खैर की लकड़ी से हुआ तैयार

नवग्रहों के अनुरूप सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश (ढाक), मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है। इसके साथ ही अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के काष्ठों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है।
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कश्मीर, असम व उतराखंड से लाई गईं लकड़ियां

काष्ठपट्ट के निर्माण देश के विभिन्न हिस्सों की आस्था भी जुड़ी है। उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से लकड़ियां एकत्र की गईं। शिवभक्तों ने इसे काशी पहुंचाया। इसके निर्माण में शास्त्रीय परंपराओं और काशी की लोक संस्कृतियों का विशेष ध्यान रखा गया है।
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