फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

काशी की गलियों में भक्तों से मिलने निकले महादेव, 356 साल के इतिहास में पहली बार हुआ ऐसा

Fri, 06 Mar 2020 02:30 PM IST
गीतार्जुन गौतम आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
काशी की गलियों में गौरा संग घूमे महादेव। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

रंगभरी एकादशी पर शिव की नगरी काशी में मानो देवलोक उतर आया हो। काशीपुराधिपति पहली बार काशी की गलियों में निकले और भक्तों संग जमकर होली खेली। इसके साथ ही भगवान शंकर और गौरा का गौना भी 356 साल के इतिहास में एक नया अध्याय रच गया। पहली बार बाबा की रजत पालकी ढुंढिराज गणेश द्वार से होकर मां अन्नपूर्णा के दर से होते हुए काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह पहुंची। अभी तक परंपरा के तहत सभी रस्में मंदिर परिक्षेत्र से ही निभाई जाती रहीं, लेकिन काशी विश्वनाथ धाम निर्माण के कारण महंत आवास मंदिर परिक्षेत्र से बाहर हो गया। 

विज्ञापन


बाबा विश्वनाथ के गौने को लेकर भी काफी दिनों तक रार भी मची रही, अंतत: रंगभरी एकादशी पर एक नया इतिहास काशीवासियों ने लिख दिया। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास से मंदिर तक पांच सौ मीटर के दायरे में गलियों में बस अबीर और गुलाब की सुवास बिखर उठी। भक्त भी अपने भगवान को अपने बीच पाकर निहाल हो उठे। उन्हें तो मानों साक्षात तीनों लोक ही मिल गया।

महंत आवास पर तो आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमा पर गुलाल चढ़ाने भक्त दोपहर से ही पहुंचने लगे थे। बाबा की ससुराल में तब्दील महंत आवास से जैसे ही गौने की पालकी निकली तो गलियों में बस हर-हर महादेव का जयघोष और डमरुओं की नाद गूंज उठी। पहले बाबा की पालकी महंत आवास से 20 कदम का फासला तय करके मंदिर के गर्भगृह तक ही जाती थी।

विज्ञापन
विज्ञापन

बाबा का मिला आशीर्वाद
चेतगंज की किरण गुप्ता ने बताया कि मैं हर साल बाबा की रंगभरी एकादशी पर दर्शन करने आती हूं। पहली बार बाबा काशी की गलियों में गौरा के गौने के लिए निकले यह हमारे लिए तो सबसे बड़ा आशीर्वाद है। महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि यही एक दिन होता है जब बाबा खुद भक्तों के संग होली खेलते हैं। आज पहली बार बाबा भक्तों को आशीष देने गौरा के साथ काशी की गलियों में निकले हैं।

1934 में स्वरूपरानी ने किए थे बाबा के दर्शन
सन 1934 में जब स्वतंत्रता संग्राम संग खादी अभियान भी गर्म था, रंगभरी एकादशी पर पं. जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपरानी बाबा का दर्शन करने आई थीं। उन्होंने देवाधिदेव की रजत प्रतिमा को खादी धारण कराने की इच्छा महंत परिवार से जाहिर की। उन्होंने तत्कालीन महंत पं. महावीर प्रसाद तिवारी को इससे संबंधित पत्र सौंपा था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें