शारदीय नवरात्र की शुरुआत आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से यानी तीन अक्तूबर को हो रही है। तिथियों की घट-बढ़ के बाद भी इस बार नवरात्र पूरे नौ दिन का रहेगा। नवरात्र में चतुर्थी तिथि की वृद्धि और नवमी तिथि का क्षय हो रहा है। 11 अक्तूबर को महानवमी और 12 अक्तूबर को दशहरा मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल प्रतिपदा की शुरुआत तीन अक्तूबर को मां दुर्गा के आह्वान के साथ होगी। कलश स्थापन का मुहूर्त सुबह 6:07 बजे से 9:30 बजे तक रहेगा। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:37 बजे से 12:23 बजे तक अतिशुभ रहेगा। हालांकि सुबह से शाम तक में कभी भी घट स्थापन किया जा सकता है।
शास्त्रानुसार सुबह घट स्थापन का विशेष महत्व है। नवरात्र तीन अक्तूबर से आरंभ होकर 11 अक्तूबर तक चलेगा। नवरात्र में चतुर्थी तिथि की वृद्धि और नवमी तिथि का क्षय है। इसलिए 11 अक्तूबर को ही महाष्टमी और महानवमी का व्रत दोनों किया जाएगा। महाष्टमी तिथि 10 अक्तूबर को सुबह 7:29 पर लगेगी जो 11 अक्तूबर को सुबह 6:52 बजे तक रहेगी।
इसके बाद 6:52 बजे से नवमी तिथि लग जाएगी और 12 अक्तूबर की भोर में 5:47 बजे तक रहेगी। उसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी। नवमी का हवन-पूजन नवमी में करना चाहिए। इस बार माता का आगमन डोली पर हो रहा है जिसका फल अतिशय कष्ट व विपत्ति है। माता का गमन हाथी पर हो रहा जिससे अत्यधिक वर्षा होगी। अत: इस बार माता का आगमन और प्रस्थान दोनों शुभ नहीं है।
नवरात्र का पारण 12 अक्तूबर को होगा
महागौरी माता अन्नपूर्णा की परिक्रमा 11 अक्तूबर को सुबह 6:52 बजे से पूर्व करनी चाहिए। नवरात्र व्रत का पारण उदयकालीन दशमी में 12 अक्तूबर को होगा। शाम में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होगा। महाष्टमी व्रत 11 अक्तूबर को रहेगा और पारण 12 अक्तूबर की भोर 5:47 बजे से पूर्व करना होगा। नौ दिनों का व्रत रखने वाले व्रत का पारण 12 अक्तूबर को सुबह 6:13 बजे के बाद करें। महानिशा पूजन निशिथकाल में 10 व 11 अक्तूबर को करें।
मार्कंडेय पुराण में भी मिलता है वर्णन
शारदीय नवरात्र का वर्णन मार्कंडेय पुराण में दुर्गा सप्तशती के द्वारा प्रकट किया गया है। उसमें वर्णित है कि शुंभ-निशुंभ और महिषासुरादि तामसिक स्वभाव वाले असुरों के जन्म होने से देवगण दुखी हो गए। सभी देवगणों ने मिलकर महामाया भगवती की स्तुति की। तब देवी ने प्रसन्न होकर देवगणों को वरदान दिया कि डरो मत, मैं अचीर काल में प्रकट होकर अतुल पराक्रमी असुरों का संहार करूंगी।
मेरी प्रसन्नता के लिए तुम लोगों को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिनों तक मेरी आराधना करनी चाहिए। इसी आधार पर देवी नवरात्र का महोत्सव अनादि काल से आज तक चला आ रहा है। नौ रात्रियों तक व्रत-पूजन करने से इस व्रत का नाम नवरात्र पड़ा।