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मधुश्रावणी तीज: 14 दिनों के लिए नवविवाहिताओं ने त्यागा नमक

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पति की लंबी आयु व अखंड सौभाग्य की कामना के साथ मिथिला की नवविवाहिताओं का मुख्य पर्व मधुश्रावणी शुरू हो गया है। इसके तहत नवविवाहिताएं 14 दिनों तक नमक का त्याग कर देती हैं। नवविवाहिताएं नाग-नागिन, हाथी, गौरी, शिव आदि की प्रतिमा बनाकर जहां अपने-अपने घरों में पूजा कर फल व मिठाई का भोग लगा रही हैं। वहीं शाम को सुहागिनें टोली बनाकर बाग-बगीचे में फूल तोड़कर लाती है, इससे अगली सुबह पूजा होती है।
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सुंदरपुर निवासी वाणी भारद्वाज बताती हैं कि मधुश्रावणी पर्व जीवन में सिर्फ एक बार शादी के पहले सावन में मनाया जाता है। 14 दिनों के इस कठिन व्रत में नवविवाहिताएं नमक के बिना 14 दिन भोजन ग्रहण करती हैं। इस व्रत में अनाज, मीठा भोजन खाया जाता है। व्रत के पहले दिन विवाहिताएं फलाहार करती हैं। 14दिनों तक सुहागिन महिला व्रत रखकर मिट्टी और गोबर से बने विषहरा और गौरीशंकर की विशेष पूजा कर कथा सुनती हैं। कथा की शुरुआत विषहरा के जन्म और राजा श्रीकर से होती है। मधुश्रावणी व्रत के अंतिम दिन टेमी दागने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।
सोलह शृंगार करके फूल तोड़ने जाती हैं नवविवाहिताएं
वसंता कॉलेज फॉर वुमेन की डॉ. वंदना झा ने बताया कि 14 दिनों तक नवविवाहिताएं सोलह शृंगार करके शाम में फूल और पत्ते तोड़ने जाती हैं। मैथिली लोकगीत हर नवविवाहिताओं के घरों से सुनाई देते हैं। हर शाम महिलाएं आरती करती हैं और गीत गाती हैं। पूजा के आखिरी दिन पति का शामिल होना जरूरी होता है। साथ ही ससुराल से बुजुर्ग नए कपड़े, मिठाई, फल आदि के साथ पहुंचते हैं।
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ससुराल से आए अनाज से तैयार होता है भोजन
लंका निवासी वंदना झा ने बताया कि यह व्रत नवविवाहिताएं अपने मायके में मनाती हैं। नवविवाहिताएं जमीन पर सोती हैं। रात में वह ससुराल से आए अनाज से भोजन करती हैं। पूजा के लिए नाग-नागिन, हाथी, गौरी, शिव की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। फिर उनका पूजन फूलों, मिठाइयों और फल को अर्पित करके किया जाता है। पूजा के लिए रोज बासी फूलों और पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है।
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