साहित्यकार डॉ. मधुकर मिश्र ने बताया मिर्जापुर और बनारस की लोकसंस्कृति कजरी की आत्मा से जुड़ी हुई है। कजरी मेला भी है, गीत भी है, पर्व भी है और खेल भी। पहले कजरी खेली जाती है, फिर गाई जाती है। रामनगर में वर्ष 1818 में कजरी मेले की शुरुआत हुई थी। बाद में शिवाला पर 14 दिनों का कजरी का मेला लगता था। उसमें काशी नरेश आते थे। कजरी दंगल जीतने वाले को पांच रुपये इनाम में देते थे। शिवाला के महंत इनाम में तीन रुपये देते थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र का काल कजरी का स्वर्ण काल था। गांवों से जमींदारी खत्म होने के बाद कजरी का दंगल बंद हो गया था। अब धीरे-धीरे नई पीढ़ी में कजरी के प्रति जागरुकता आ रही है।
डॉ. मिश्र के मुताबिक गौहर बानो के प्रेमी को जब अंग्रेज गिरफ्तार करके मिर्जापुर ले गए और वहां से उसे काले पानी की सजा दे दी गई। इस पर डीएम ने उससे अंतिम अभिलाषा पूछी। गौहर बानो को बुलाया गया और उन्होंने नाव पर बैठकर मिर्जापुर कईला गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कईला बलमू... सुनाया तो हर किसी की आंख नम हो उठी थीं।
बिहड़ा के गणेश प्रसाद सिंह हाथी पर बैठकर बफत की कजरी सुनने के लिए आते थे। एक बार कजरी सुनकर वह इतने भावविभोर हो उठे कि उन्होंने अपना हाथी ही इनाम में दे दिया। सुबह जब वह चलने लगे तो गायक बफत हाथ जोड़कर खड़े हो गए कि साहब इस हाथी को खिलाएगा कौन? इस पर उन्होंने हाथी तो ले लिया लेकिन जब तक जीवित रहे वह बफत को पांच गाड़ी अनाज भेजते थे।
उपशास्त्रीय गायिका डॉ. सोमा घोष ने बताया कि ककहरा, शायरी कजरी, ढुनमुनिया कजरी, चौलरिया कजरी, बारहमासा, चौमासा जैसे कजरी के प्रकार लोक मानस में मशहूर रहे हैं। अखाड़ों से कई उर्दू शायर जुड़े होते थे, जो शृंगार प्रधान कजरी रचते थे। कजरी की उत्पत्ति महाभारत काल से मानी जाती है। प्राचीन कथाओं के अनुसार आठवीं संतान की रक्षा के लिए वसुदेव भादो की अंधेरी रात में नंद के घर कृष्ण को पहुंचाकर जब नंदजा को ले आए थे और कंस ने उनको पटकने की कोशिश की तब वह उसके हाथ से छूटकर विंध्याचल में जा गिरी थीं। वही नंदजा विंध्याचल देवी के नाम से पूजी जाती हैं। इनका एक नाम कज्जला भी है। इसी से कजरी की उत्पत्ति मानी जाती है। भादो कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मिर्जापुर, बनारस में कज्जला देवी (विंध्यवासिनी) का जन्मोत्सव कजरी उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
विरह, प्रेम, मिलन और मनुहार को सुरों के जरिये व्यक्त करने के लिए कंठ से जो फूटा, वह लोकगीत है कजरी। काले बादलों के शोर, झूमते पवन की पुरवाई कजरी की उपज है। हर लोक में कजरी रची और गाई गई। चौराहों पर आमने-सामने कजरी होती थी। जवाबी कजरी, दंगली कजरी देखने, सुनने के लिए काशी नरेश बग्घी पर सवार होकर निकलते थे। - राजेश्वर आचार्य।
काशी की परंपराएं भी अनूठी हैं। रतजगा को तो हम लोगों को बचपन से ही इंतजार रहता था। जलेबा खाने के साथ ही कजरी सुनने को भी मिलती थी। हम लोगों ने तो गिरिजा देवी को सुना, सिद्धेश्वरी देवी और बागेश्वरी देवी की कजरी भी सुनी। नई पीढ़ी अब अपने लोकगीत और परंपराओं के प्रति सजग हो रही है। खूब जलेबा खाएं और कजरी गुनगुनाएं। - पं. साजन मिश्र।