करीब 132 वर्षों के बाद अपने परिवार के सदस्यों का पता लगाकर करीब पांच बजे टूरिस्ट वाहन से वह उतराव गांव में अपने रिश्ते में भाई शिवजी यादव और श्री भगवान यादव के घर पर पहुंचे। उनके साथ उनकी पत्नी गीता लखन तथा वाराणसी से एक गाइड भी था। गांव पहुंच कर जब वह अपने भाइयों से मिले तो दोनों ओर से प्रेम का रस फूट पड़ा। गांव का नजारा भी बदल गया था। डेविड गांव के कई लोगों से मिले। परिजनों को अपने देश बुलाया। कहा कि वह गांव के लिए भी कुछ करेंगे। करीब दो घंटे प्रवास के बाद वह फिर वाराणसी चले गए।
उतरांव गांव में दो घंटे के अपने प्रवास में ही डेविड लखन तथा गीता लखन ने लोगों से इतनी आत्मीयता बना ली कि परिजन उनसे काफी घुल मिल गए। उत्साह से भरपूर डेविड ने बताया कि 1888 में जब अंग्रेज उनके परदादा के पिता लखन अहीर को लेकर त्रिनिदाद एंड टोबैगो आए तो उस समय उनका इंग्रेशन पास बनाया गया था। उस समय वहां उनका एक बायोडाटा तैयार किया जिसमें देश के नाम के साथ ही गांव का नाम तथा कुछ अन्य विवरण भी लिखा हुआ था।
इसे देखने के बाद ही उन्हें भारत में रह रहे अपने पूर्वजों को खोजने और मिलने का ख्याल आया। इस इंग्रेशन पास के आधार पर त्रिनिदाद की सरकार से संपर्क किया और सारा रिकार्ड खंगाला, जिससे बहुत सी जानकारियां मिलीं। इसके बाद, उन्होंने भारत के एक एनजीओ के माध्यम से गाजीपुर के अभिलेखागार से संपर्क किया। इसके बाद उतरांव गांव में रह रहे सभी परिजनों के बारे में जानकारी मिली।