वाराणसी। कुछ महीने पहले तक सिल्ट से ढंका अस्सी घाट गुरुवार की रात लोक राग के उत्सव में रंग गया। बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग सभी की आंखों में इस उत्सव की छवि बस गईं। मौका था सोन चिरैया धरोहर के तहत लोक धुनों, नृत्य शैलियों और गाथाओं की प्रस्तुति का।
इस दौरान गंगा की लहरों पर बजरे सजे और दर्शकों की भीड़ भी जुटी। इस दिलकश क्षणों के साक्षी कई विदेशी मेहमान भी बने।
शाम छह बजे प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी के हाथों दीप प्रज्ज्वलन से सोन चिरैया के इस लोक उत्सव की शुरुआत हुई। उप शास्त्रीय गायिका मालिनी अवस्थी ने गंगा गीत से इस कड़ी को आगे बढ़ाया। पूर्वांचल के गांवों में लुप्त होने के कगार पर पहुंची लोक नृत्य शैली करमा लेकर आए घसियारा जनजाति के कलाकार।
कतवारू घसिया के निर्देशन में पुरुष-महिलाओं के समूह कदंब की डाल के रूप में करम देव को लिए मंच पर मानर की छाप और छाड़ा की गूंज के साथ थिरकते हुए आए तो तालियों की करतलध्वनि गूंजने लगी। हे करम देव हो... सातो बहिनी रहलीं उपासे हो करम देव हो...., जहां बसेली गंगा मइया दरसन देलीं अस्सी घाटे हो...।
करमा गीत की इन पंक्तियों पर करम देव की नृत्यमय प्रदक्षिणा के भाव हर किसी के अंतरमन को छू गए। इनके बाद गाजीपुर से आए कलाकारों ने धोबिया लोक नृत्य की थिरकन से लोक माटी की असल लय और महक से परिचित कराया। बहुरिया आंगन बहारे, भइल भिनसार...।
करताल, ढोल और मोरचंग के साथ घुड़सवार इस नृत्य के खास आकर्षण थे। इसके बाद सनबीम स्कूल करसड़ा के बच्चों ने लोक गाथा आल्हा की प्रस्तुति से दर्शकों के जेहनोदिल पर अलग छाप छोड़ी। इससे पहले विलुप्त हो रहे प्राचीन लोक वाद्यों की कंपोजिंग हर किसी के लिए यादगार बन गई थी। संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र और कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने सोन चिरैया की स्मारिका धरोहर का विमोचन किया। संचालन किया मालिनी अवस्थी ने।