साहित्य और भाषा से हमें विचारों की स्वतंत्रता मिलती है। संस्कृति पर भारतीय भाषाओं में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है जिसके अध्ययन की आवश्यकता है। ये बातें भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सदस्य सचिव प्रो. धनंजय सिंह ने डीएवी पीजी कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में कहीं। वे 'सांस्कृतिक अध्ययन : भाषा, साहित्य एवं मीडिया' संगोष्ठी के पहले दिन मुख्य वक्ता थे।
विशिष्ट वक्ता अंग्रेजी भाषा अध्ययन विश्वविद्यालय, पौलेंड की अध्यापिका डॉ. पेट्रिया ऑस्टिन ने कहा कि भाषा की उपयोगिता को किसी सीमा में नही बांधा जा सकता है। यूनाइटेड किंगडम (यूके) से आईं विशिष्ट वक्ता डॉ. लूसी गेस्ट ने कहा कि भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म के समान माना गया है। कार्यक्रम अध्यक्ष प्रोफेसर एम.एस पाण्डेय ने कहा कि सांस्कृतिक अध्ययन को ठीक तरह से समझने के लिए पश्चिमी सभ्यता का भी अध्ययन करना हाेगा। इस दौरान प्रो. अनुराधा बनर्जी, डॉ. मीनाक्षी पहवा, डॉ. महेश शर्मा ने भी विचार रखे।