अयोध्या में 500 साल बाद भगवान राम के विग्रह और मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराने वाले काशी के कर्मकांडी, शुक्ल यजुर्वेद के विद्वान पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित (82) का निधन शनिवार की सुबह सात बजे हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत काशी के विद्वानों ने शोक जताया है।
पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित की अंतिम यात्रा शनिवार को मंगला गौरी स्थित निवास स्थान से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली। उनके अंतिम यात्रा में पंडित गणेश्वर शास्त्री द्रविड़ और विरेश्वर शास्त्री सहित काशी के वैदिक विद्वान, कर्मकांडी और साधु-संत भी शामिल हुए।
मणिकर्णिका घाट पर उनके ज्येष्ठ पुत्र जयकृष्ण दीक्षित ने उन्हें मुखाग्नि दी। जयकृष्ण दीक्षित ने बताया कि पिताज सुबह स्नान कर रहे थे। इसी दौरान उनको चक्कर आया और शरीर शांत हो गया। वह लंबे समय से बीमार भी चल रहे थे।
रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा में वह मुख्य आचार्य थे। उनके मार्गदर्शन में ही 121 पुजारियों ने प्राण-प्रतिष्ठा के सभी अनुष्ठान पूरे कराए थे। रामलला का दंडवत करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आचार्य लक्ष्मीकांत दीक्षित का आशीर्वाद भी लिया था।
अयोध्या में पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित से मिलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- फोटो : अमर उजाला
पंडित लक्ष्मीकांत दीक्षित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण में भी शामिल थे। उनके पूर्वजों ने नागपुर और नासिक रियासत में भी धार्मिक अनुष्ठान कराए थे। लक्ष्मीकांत दीक्षित पूजा पद्धति में सिद्धहस्त और वाराणसी के मीरघाट स्थित सांगवेद महाविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य थे।
लक्ष्मीकांत दीक्षित पूजा-पद्धति की सभी विधाओं में सिद्धहस्त माने जाते थे। पंडित लक्ष्मीकांत मूल रूप से महाराष्ट्र के सोलापुर के रहने वाले थे, लेकिन उनका परिवार कई पीढ़ियों से वाराणसी में रह रहा है। उन्होंने अपने चाचा गणेश दीक्षित से वेद और अनुष्ठान की दीक्षा ली थी।
शुक्ल यजुर्वेद के प्रख्यात विद्वान पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित का जन्म सन 1942 में मुरादाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम वेदमूर्ति मथुरानाथ दीक्षित और माता का नाम रुक्मिणी दीक्षित था। वह भारत के सभी प्रमुख शहरों के अलावा नेपाल में होने वाले वैदिक अनुष्ठान में बतौर आचार्य शामिल होते थे।
मीरघाट स्थित सांगवेद विद्यालय में आचार्य रहे पं. दीक्षित शुक्ल यजुर्वेद के चुनिंदा विद्वानों में शामिल थे। उन्हें वेद सम्राट, वैदिक भूषण, वैदिक रत्न, देवी अहिल्याबाई राष्ट्रीय पुरस्कार और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत कई सम्मान भी मिले थे। इसके साथ ही चारों शंकराचार्य ने भी उनको सम्मानित किया था।
पंडित दीक्षित ने ही संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में यज्ञशाला का निर्माण कराया था। स्वामी करपात्री जी महाराज एवं निरंजनदेव तीर्थ स्वामी का उनको विशेष अनुग्रह प्राप्त था।
काशी के मूर्धन्य वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मकांड विशेषज्ञ सांगवेद विद्यालय के यजुर्वेदाध्यापक लक्ष्मीकांत दीक्षित के शिवसायुज्य (निधन) से सनातनी जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। पंडित दीक्षित के आचार्यत्व में विगत 22 जनवरी को अयोध्या में श्रीरामलला की प्राणप्रतिष्ठा हुई थी। कीर्तिशेष दीक्षित की दिवंगत आत्मा की शाश्वत शांति के लिए सांगवेद विद्यालय परिवार और श्रीगीर्वाणवाग्वर्धिनी सभा की ओर से बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना है।
विद्वत समाज ने जताया शोक
श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित के निधन पर शोक जताया है। उन्होंने कहा कि यह काशी के लिए अपूरणीय क्षति है।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय, सदस्य पं. दीपक मालवीय, प्रो. रामनारायण द्विवेदी, धर्मसंघ के महामंत्री जगजीतन पांडेय, श्री सत्यनारायण तुलसी मानस मंदिर के पुस्तकालयाध्यक्ष त्रिलोचन प्रसाद समेत समस्त विद्वत समाज ने शोक व्यक्त किया है।