काशी विद्यापीठ के प्रो रविशंकर पांडेय ने बताया कि सितंबर 1927 में बापू आठवीं बार काशी आए थे। इस दौरान उन्होंने काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में छात्रों को चरखा चलाने और खादी पहनने की सीख दी। 1934 में नौवीं यात्रा के दौरान बापू ने अस्पृश्यता के खिलाफ अलख जगाई। 27 जुलाई से दो अगस्त तक काशी में रहे और दलित बस्तियों में जाकर उनकी स्थिति जनता के सामने रखी। इस यात्रा में बापू ने काशी विद्यापीठ के कक्ष में सात दिन प्रवास किया था।
बापू की प्रतिमा स्थल को स्मारक का दिया जा रहा स्वरूप
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ परिसर में स्थित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त के प्रतिमा स्थल को भव्य स्मारक के रूप में विकसित किया जा रहा है। स्मारक को मूर्त रूप देने के लिए चुनार के पत्थरों को तराशने का काम भी जारी है। प्रतिमा कैंपस को छोटे पार्क के रूप में विकसित किया जाएगा। करीब 15 लाख रुपये की लागत से इस स्थल को छोटे पार्क के रूप में विकसित किया जाएगा। बनारस आने के दौरान बापू मानविकी संकाय के जिस कमरे में सात दिन रुके थे उसको बापू स्मृति दीर्घा के रूप में विकसित किया गया है।
लाल बहादुर वर्मा को विद्यापीठ ने बनाया लाल बहादुर शास्त्री
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री काशी विद्यापीठ के पुरातन छात्र रह चुके हैं। काशी विद्यापीठ ने ही लाल बहादुर वर्मा को लाल बहादुर शास्त्री बना दिया। अपने यशस्वी छात्र को काशी विद्यापीठ आज भी गौरव के साथ नमन करता है। हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. श्रद्धानंद ने बताया कि शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से ही 1925 में स्नातक की डिग्री हासिल की। इस डिग्री को उस समय शास्त्री कहा जाता था। लाल बहादुर शास्त्री ने विद्यापीठ से ही अपने नाम के आगे शास्त्री लगाना शुरू किया। पहले उनका नाम लाल बहादुर वर्मा था। दर्शन उनका पसंदीदा विषय था। काशी विद्यापीठ में उनकी स्मृति में एक छात्रावास भी है।
सुना हर हर महादेव का घोष, तोड दिया प्रोटोकॉल
पद्मश्री राजेश्वर आचार्य अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहते हैं कि बात 1962 63 की है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पं लाल बहादुर शास्त्री दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय युवा महोत्सव में शामिल होकर लौट रहे थे, बीएचयू के छात्रों ने जब अपने पीएम को देखा तो उन्होंने हर हर महादेव का जयघोष कर उनका अभिनंदन किया। दिल्ली में हर हर महादेव का जयघोष सुनकर पीएम के कदम थम गए। प्रोटोकॉल तोड़कर शास्त्री जी छात्रों के पास पहुंचे। उनसे मुलाकात की और उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाई। विद्यार्थियों की टीम में पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य बतौर सांस्कृतिक सचिव शामिल हुए थे।