वाराणसी। परंपरा और उम्र के हिसाब से काशी महान शहर है। इसकी परंपरा को बचाने की जरूरत है। यह एक ऐसी नगरी है, जहां की कला, संस्कृति, आध्यात्म की चर्चा हर जगह होती है। युवा कवि डॉ. शशिधर का कहना है कि सैलानी गंगा में स्नान, आरती, नौकायन, काशी के घाटों का सौंदर्य देखने के साथ ही महादेव का दर्शन पूजन करने के लिए यहां आते हैं। साथ ही काशी के स्वादिष्ट खानपान का भी स्वाद चखते हैं, लेकिन यहां आने के बाद जाम का झाम झेलना पड़ रहा है। विदेशी सैलानियों के लिए हर दिन नए-नए रेस्टोरेंट खुलते जा रहे हैं। पुरी दुनिया में हेरिटेज को बचाकर रखा जाता है, वह इसलिए कि उसे दोबारा लौटाया नहीं जा सकता है। बाजार की आंधी ने काशी की संस्कृति, स्वरूप और स्वाद को बिगाड़ दिया है।
डा. शशिधर कहते हैं कि काशी में बाटी चोखा, मलईयों के दीवाने लोग अब भी हैं। मलईयो अब मथानी से नहीं बल्कि मशीन से तैयार हो रहा है। यह एक बड़ा फर्क है, समय के बदलाव का। पिछले दिनों काशी के किचन में जंक फूड आपूर्ति करने वाली कंपनियों का प्रवेश हुआ है। इसने काशी के देशी स्वाद को कम करने का काम किया है। काशी का भूगोल और आबादी में बड़े बदलाव पिछले दिनों हुए हैं। इक्के और साड़ से जो आधुनिक मध्य वर्ग नाक सिकोड़ता था अब हर 200 मीटर पर लाल पीली आंखों का सामना करना पड़ रहा है। चारों तरफ जिस तरह से बेतरतीब विकास हो रहे हैं, उस हिसाब से प्राथमिक सुविधाएं बिल्कुल नहीं है। ऐसे में यह शहर पूरे जाम में फंसा हुआ है। इंसान और भगवान दोनों को कहीं शांति का स्पेस नहीं मिल पाता है। दोनों भीड़ से घिरे हैं।