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करवाचौथ पर सौ साल बाद बन रहे राजयोग सहित छह शुभयोग

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वाराणसी। करवाचौथ पर सौ साल बाद चार राजयोग सहित आधा दर्जन शुभ संयोग निर्मित हो रहे हैं। तिथि, वार, नक्षत्र और ग्रहों का संयोग पूजा की शुभता को और बढ़ाएगा। सौभाग्य पर्व पर शिव, अमृत और सर्वार्थसिद्धियोग के साथ शंख, गजकेसरी, हंस और दीर्घायु नाम के राजयोग भी बन रहे हैं।
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ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि करवाचौथ पर जब चंद्रमा और पति की पूजा की जाएगी तो उस दौरान गोचर कुंडी में बृहस्पति दांपत्य जीवन के भाव में अपनी ही राशि के साथ रहेगा। ये स्थिति सौभाग्य बढ़ाने वाली रहेगी। जिससे ये पर्व और भी शुभ हो जाएगा। बुधवार और चतुर्थी के संयोग में होने वाली गणेश पूजा का फल और बढ़ जाएगा। इस बार करवा चौथ मृगशिरा नक्षत्र में किया जा रहा है। नक्षत्र का स्वामी मंगल होने से यह व्रत समृद्धि बढ़ाने वाला रहेगा। इस दिन सूर्योदय भी चतुर्थी तिथि में होगा और चंद्रोदय भी। पिछले कुछ सालों में कई बार ऐसा हुआ है जब चतुर्थी तिथि 2 दिन तक रही और व्रत को लेकर असमंजस की स्थिति बनी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। इतने सारे शुभ संयोग होने से ये पर्व मनोकामनाएं पूरी करने वाला रहेगा।
आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त 4 नवंबर को शाम 05 बजकर 34 मिनट से शाम 06 बजकर 52 मिनट तक का रहेगा। चंद्रोदय शाम 07 बजकर 57 मिनट पर होगा। चांद के दर्शन करने के उपरांत व्रत पूर्ण होगा।
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करवा चौथ व्रत के नियम
आचार्य शास्त्री ने बताया कि पति कि लंबी आयु के लिए रखा जाने वाला करवाचौथ का व्रत सूर्योदय से पहले शुरू हो जाता है और चांद निकलने के बाद खत्म होता है। सुहागिन महिलाएं चांद को अघ्र्य देने के बाद छलनी में दीपक रख कर चंद्रमा की पूजा करती है और फिर इसी छलनी से पति को देखती हैं। इसके बाद पति के हाथों पानी पीकर अपना दिनभर का निर्जला व्रत खोलती हैं। शाम के समय चंद्र उदय से एक घंटा पहले पूरे शिव परिवार की पूजा का विधान है। पूजन के समय व्रत रखने वाली महिलाओं को पूर्व दिशा की और मुख करके बैठना चाहिए।
चंद्रमा की होती है पूजा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ का व्रत पति-पत्नी रिश्ते की डोर को और अधिक मजबूती प्रदान करता है। चंद्रमा को आयु, सुख और शांति का कारक माना गया है और इनकी पूजा से शादीशुदा जिंदगी खुशहाल बनती है और पति की आयु भी लंबी होती है।
महाभारत से हुई व्रत की शुरुआत
आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। अर्जुन की पत्नी द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। तभी उनके सखा श्रीकृष्ण उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करने के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए विधि विधान से द्रौपदी करवाचौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।
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