रागों की तासीर झुलसा देने वाली खड़ी दोपहरी में भी है और बादलों के फटने के एहसास में भी। एक राग से आग लगती है तो दूसरे से दिल में धुएं के साथ उठती लपटों को बुझाने के जतन होते हैं। अकबर के दरबार में कभी तानसेन ने राग दीपक जब गाया था तब बुझे दीये जल उठे थे। दिलों में आग लग गई थी। खुद तानतेन भी झुलसने लगे थे। राग मिया की मल्हार तब ताना रीरी ने गाया था। इसी राग के गाए जाने के बाद बारिश हुई थी और तानसेन के प्राणों की रक्षा हो सकी थी। यह कहना है ठुमरी गायिका पद्मश्री सोमा घोष का।
वह कहती हैं कि याद करिए जब आषाढ़ के बादल तड़कते, गरजते हैं। बरसते नहीं। विरह में सहने की क्षमता न होने पर घहरा कर फट जाना ही मल्हार है। राग मल्हार की अवतारणा नटराज शिव के नर्तन की तरह होती है। जब होता मियां का मल्हार गाया जाता है तब बादल भी संगीतमय अंदाज में चल पड़ते हैं। रस की फुहार पड़ने लगती है। वह मल्हार की बंदिश पर आलाप लेती हैं- गगन मरदल बाजे धम धम/ बादर नटवर नाचे छमछम.../ कहती हैं कि मेघों की उमड़ घुमड़ को खिड़कियों से निहारकर विरहिन डर जाती हैं लेकिन यह एहसास बाहर भी साफ दिखाई देता है। आसमान में पंछी भी डर के मारे इधर-उधर भागने लगते हैं। सोमा मुस्कुराते हुए बताती हैं कि इस मौसम में फुहार पड़ते ही मुझे बनारस की वो कजरी याद आ जाती है- रिमझिम बरसे ला बदरिया सखिया गावेलीं कजरिया / मोरी भींजे रे चुनरिया बचाय ला बलमू...।
वह कहती हैं कि गांव की महिलाएं सोलह शृंगार कर आम, नीम की डालियों पर झूला डाल देती हैं। खेतों में बीज बोने के लिए घर से निकले प्रियतम को बुलाने के लिए सज-धज कर वह झूले पर कजरी गाती हैं। हरे रामा रिमिझिम बरसे ला पनियां/ चलि तो आओ जनिया रे हरी...। फिर वह अपनी पसंदीदा ठुमरी गाती हैं- मोरे सइयां जी उतरेंगे पार/नदिया धीरे बहो...। सोमा पुराने दिनों कीयादों में खो जाती हैं। कहती हैं कि पहले जब बादल लगते थे, तब बनारस की गायिकाएं यह बंदिश गाने लगती थीं -मोरा सइयां रहे ओही पार नदिया बैरन भई...। दूसरी बंदिश उनकी जुबान पर आती हैं-निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमके/ दादुर मोर मचाए शोर/छाई घटा घनघोर...। कहती हैं कि प्रियतम जब दूर रहते हैं तब विरह में प्रियतमा के भीतर की पीड़ा ऐसे ही भावों में व्यक्त होती है। जब घटाएं छा जाती हैं तब जी घबराने लगता है। कहीं मेघ मल्हार तो कहीं कजरी गाई जाने लगती है।