तुलसीघाट पर नाग नथैया की लीला देखने के लिए उमड़ा हुजूम।
काशी में उत्सव, मेले, शोभायात्राएं और लीलाएं भीड़ या शोर का हिस्सा नहीं होतीं। ऐसे उत्सवों को राष्ट्रीय समस्याओं, मुद्दों, सामाजिक सरोकारों से जोड़ा जाने लगा है। इसकी बानगी गुरुवार को दिखी नाग नथैया की लीला में। गंगा तट पर देश-दुनिया से उमड़े लाखों के जनसैलाब के बीच गंगा तट पर बने यमुना रूपी दह में प्रदूषणरूपी कालियानाग के मर्दन की लीला के जरिए गंगा निर्मलीकरण का संदेश दिया गया। इस लीला की शुरुआत संत तुलसीदास ने 455 वर्ष पहले तुलसी घाट पर की थी।
द्वापर में कालिया नाग ने यमुना को प्रदूषित किया था अब नालों के प्रदूषण से गंगा बेजार हो रही है। तब एक कालिया नाग था, अब गोमुख से गंगासागर के बीच नाला रूपी ऐसे हजारों कालिया नाग हैं, जिन्हें नाथे बिना गंगा निर्मल नहीं हो सकतीं।
गुरुवार को तुलसी घाट पर सीढ़ियों, मढ़ियों, मंदिरों की बुर्जियों से लेकर छतों, गंगा की मध्यधारा पर कतारबद्ध नावों-बजड़ों पर उमड़े सैलाब के बीच कालिया नाग के मर्दन की लीला का संदेश यही था। शाम चार बजे से ही नावों-बजड़ों के झुंड तुलसी घाट पर लंगर डालने लगे। महामंडलेश्वर संतोष दास सतुआ बाबा संतों, बटुकों के साथ बजड़े पर सवार होकर पहुंचे तो विदेशी पर्यटकों, संस्कृति प्रेमियों के नाव-बजड़ों की अलग कतारें लगने लगीं। शाम 3:30 बजे तक तुलसी घाट की बालकनीनुमा खड़ी सीढ़ियों, मढ़ियों और मंदिरों की छतों पर कहीं तिल रखने की जगह नहीं बची। इस दौरान डाफी गांव से आई रामायणियों की मंडली बृज विलास के छंद, सोरठों का पखावज और झांझ पर गान करने लगी। कृष्ण अपने बाल सखाओं के साथ गंगा तट पर गेंद खेलने लगे। खेल-खेल में गेंद उसी दह में जा गिरी जिसमें कालिया नाग पहले से मौजूद था। बाल सखाओं के आग्रह पर कान्हा ने कदंब की डाल से शाम 4:38 बजे यमुना रूपी गंगा में छलांग लगा दी और इसी के साथ हर-हर महादेव का जयघोष गूंजने लगा। नावों-बजड़ों से घंटे, घड़ियाल बजने लगे। आरती उतारी जाने लगी। डमरूनाद से पूरा लीलास्थल गुंजायमान हो गया। कुछ देर में ही कृष्ण कलियानाग के फन पर बंशी बजाते हुए प्रगट हुए तो फिर उन क्षणों की झांकी के दर्शन कर श्रद्धालु निहाल हो उठे।