गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि राम और कृष्ण किसी जाति, संप्रदाय के नहीं बल्कि हर हिंदुस्तानी के हैं। हर उस व्यक्ति के हैं जो हिंदुस्तान का है और जिसका हिंदुस्तान है।
रामायण और महाभारत का रिश्ता हर हिंदुस्तानी से है और जो हिंदुस्तानी इस रिश्ते को नहीं मानता कहीं ना कहीं उसके अंदर खोट है। संकट मोचन संगीत समारोह के मंच पर जावेद ने संवाद की शुरुआत दिल्ली की संस्था हुक द्वारा शांति दूत सम्मान की चर्चा से की।
उन्होंने कहा कि जब मुझे पता चला कि संकट मोचन संगीत समारोह में मुझे शांति दूत के सम्मान से विभूषित कि या जाने वाला है तो मैं हैरत में पड़ गया। मेरी दृष्टि में असली शांति दूत तो यह मंदिर है। असली शांति दूत इस मंदिर के महंत वीरभद्र जी थे।
मैंने जब पहली बार उनके दर्शन किए थे तो मुझे उनके चारों ओर एक आभामंडल दिखाई दिया था। मैंने जीवन में बहुत कम लोगों के पैर छुए हैं और जिन लोगों के मैंने हमेसा पैर छुए हैं उनमें से एक पंडित वीरभद्र मिश्र जी भी थे।
मैं तो कहता हूं कि अगर उनके अंदर जो करुणा और नेकी थी उस का सौवां हिस्सा भी हमारे अंदर आ जाए तो यह पूरा देश स्वर्ग बन जाए। जावेद अख्तर ने कहा कि जरूरत है कि हम अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें।
ऊंचाई में जितना बढ़ना है बेशक बढ़ें मगर गहराई में जड़ें अगर न रहीं तो हम बहुत ऊंचे उठकर भी टिके नहीं रह पाएंगे। इसलिए हमें अपने संगीत की तहजीब और संस्कार से कभी भी दूरी नहीं बनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब मैं पहली बार बनारस आया था और तुलसी घाट गया था तो मुझे नजीर साहब के चार मिसरे याद आए थे। नजीर साहब ने लिखा है यह घाट तुलसी के नाम का है, यहीं वह करते थे जाप देखो, जहां गंगा वहीं तुलसी, पवित्रता का मिलाप देखो। यह स्थली पवित्रता के मिलाप की स्थली है। संवाद के अंत में जावेद अख्तर ने अपनी एक छोटी सी कविता सुबह की गोरी के कुछ अंश सुनाएं।