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डाक्टर जंग बहादुर सभी को बोलते थे सर

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वाराणसी। बात करीब दस साल पहले की है जब मैं भेलूपुर स्वामी विवेकानंद हॉस्पिटल में बतौर फिजीशियन कार्यरत था। तब डॉक्टर जंग बहादुर डिप्टी सीएमओ के रूप में स्वास्थ्य विभाग में अपनी सेवा दे रहे थे। कोरोना से मौत की खबर मिलने के बाद से ही मन बहुत व्यथित है। यह विश्वास नहीं हो रहा है कि डॉक्टरों के हित को लेकर दिन-रात चिंतित रहने वाले एडिशनल सीएमओ की इस तरह मौत हो जाएगी।
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डॉक्टर जंग बहादुर की खासियत यही थी कि वह सीएमओ कार्यालय हो या फिर किसी अस्पताल में दौरे का समय। छोटा हो या बड़ा सभी के लिए उनके जुबान से सर शब्द का संबोधन निकलता था। इस मधुरता से वह लोगों के दिल में जगह बना लेते थे। फिजीशियन से लेकर के डिप्टी सीएमओ, एडिशनल सीएमओ तक के अपने सफर के दौरान आज तक मैंने कभी भी डॉक्टर जंग बहादुर को गुस्से में नहीं देखा था। अस्पतालों से जुड़ी शिकायतों के निस्तारण का मामला हो या फिर संचारी रोग में सेवा देने का कार्य। सभी जिम्मेदारियों को सतर्कता के साथ उन्होंने निर्वहन किया। उनकी कार्य कुशलता से सीखने को मिलता था। अगर कोरोना काल की बात करें तो मार्च के महीने में जब कोविड अस्पताल में मरीज भर्ती होने लगे तो कोविड हॉस्पिटल में ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के देखभाल, होटल में रहने की जिम्मेदारी डॉ. जंग बहादुर को मिली। इसके बाद से स्वास्थ्य कर्मियों के खानपान सहित अन्य व्यवस्थाओं के बारे में फीडबैक लेने से लेकर के 14 दिन की क्वारंटीन की अवधि पूरी होने के बाद वह खुद भी गेस्ट हाउस/ हॉस्पिटल में जहां डाक्टर रहते थे, वहां जाकर उनसे बातचीत करते थे। आज भी वह दिन याद है जब कोविड ड्यूटी करने वाले डाक्टरों पैरामेडिकल स्टाफ के लिए हाइड्रा क्सिक्लोरोक़वीन दिए जाने का फैसला हुआ तो सबसे पहले औषधि भंडार कक्ष में डॉ.जंग बहादुर ही आए और उन्होंने 79 स्वास्थ्य कर्मियों की लिस्ट सबसे पहले दी। मरीजों की सेवा में लगे डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ को दवाएं भी दिलवाई। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए चिंतित जंग बहादुर जिनके नाम में ही जंग और बहादुर दोनों शब्द जुड़ा है। ऐसे में कोविड की जंग में एक बहादुर सिपाही के तौर पर उन्होंने सदैव डॉक्टरों के साथ-साथ अन्य लोगों के लिए भी पूरी लड़ाइयां लड़ी अब उनकी मौत के बाद उसकी भरपाई कर पाना मुश्किल होगा।- डॉ. संजय राय,एडिशनल सीएमओ
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