यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है, हवा की ओट भी लेकर चराग जलता है।... मंजूर हाशमी का यह शेर जिदंगी को जिंदादिली के साथ जीने की प्रेरणा देता है। इसी जिंदादिली के साथ कई महिलाएं पति के जाने के बाद हिम्मत की पिटारी बांधकर आगे बढ़ चली हैं। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर हम ऐसी ही महिलाओं से रूबरू होंगे जिन्होंने मुश्किल आने पर इन महिलाओं ने आंसू नहीं बहाए, बल्कि उन आंसुओं को अपनी ताकत बनाकर अपनी शक्ति को समेटा और परिवार को नए सिरे से जिंदगी की पटरी पर ले निकलीं।
नौकरी कर बेटे को बनाया काबिल
मंडलीय अस्पताल में फार्मास्टि रहे जयनाथ दुबे के मृत्यु 1994 में जब हुई तो उनकी पत्नी इंदु को लगा जैसे उनकी दुनिया ही खत्म हो गई हो। लेकिन जब बेटे का चेहरा देखा तो इंदु ने संघर्षों भरा रास्ता चुना। कई नौकरी ढूंढने और दफ्तरों में चक्कर लगाने के बाद उन्हें किसी तरह सीएमओ कार्यालय में कनिष्ठ लिपिक के पद पर नौकरी मिली।
इंदु के सामने अपने इकलौते बेटे को अच्छी परवरिश देने की समस्या थी। लेकिन इंदु ने नौकरी के साथ इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। आज मां के संघर्षों ने उन्हें काबिल इंसान बना दिया है। वर्तमान में इंदु के बेटे उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अंतर्गत हिंदी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर है।