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अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस: तुम पूनम मैं अमावस, तुम कुल्हड़ वाली चाय मैं बनारस, जानें काशी की चायमिजाजी

Fri, 21 May 2021 01:48 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

काशी में चायमिजाज की बात ही निराली है। अस्सी घाट पर पप्पू की चाय पूरे शहर में मशहूर है। दुकान कई दशकों पुरानी है। चाय के मालिक बताते हैं कि यह दुकान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रखी गई थी।
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अस्सी स्थित पप्पू की चाय की अड़ी पर चाय बनते देखते हुए पूर्व रेल मंत्री जार्ज फर्नांडिस, (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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तुम पूनम मैं अमावस तुम कुल्हड़ वाली चाय मैं बनारस...। कतार में सजी दर्जनों गिलासों में एक साथ चाय का अर्क टपकाना और उसके बाद कलछुल से उसमें दूध और चीनी मिलाना। एक खास स्टाइल में तैयार चाय में चम्मच खड़काना... पूरी प्रकिया में एक रिदम है। यह नजरों को भी बांधती है। साध्य को साधती है। कुछ ऐसी है अस्सी पर पप्पू की चाय की अड़ी। अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर हम आपको रूबरू कराते हैं काशी की चायमिजाजी से।  

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अस्सी की चाय दुकानों पर आबाद अनूठे बौद्धिक द्वीपों की अहमियत काफी पहले से रही है। यह वह स्थान है, जहां कभी डॉ. राममनोहर लोहिया, राजनारायण से लेकर डॉ. नामवर सिंह और सुदामा पांडेय धूमिल जैसे देश के अग्रणी राजनीतिक व साहित्यिक विचारकों की उपस्थिति हुआ करती थी। इनके स्वरूप और महत्व को काशीनाथ सिंह ने अपने बहुचर्चित उपन्यास काशी का अस्सी में सविस्तार चित्रित किया और दुनिया के सामने पहली बार व्यापक रूप में पेश  किया। इस पर बनी फिल्म मोहल्ला अस्सी ने इसे और ज्यादा जनविस्तार दिया।

काशी का अस्सी में पप्पू की अड़ी का वर्णन करते हुए डॉ. काशीनाथ सिंह ने लिखा है कि आज के अक्खड़ी मिजाज वाले शहर बनारस के साल 1918 में भी, जब काशी के ब्राह्मण चाय को चाह कहते और अंग्रेजों का पेय होने के कारण पीने से परहेज करते थे,  यह उनके घर चुपके से जाने लगी। ये जलवा है भारत में चाय का।

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काशी नाथ सिंह, राजनारायण और गया सिंह - फोटो : अमर उजाला।
सोनभद्र से आए थे पप्पू के पुरखे
अस्सी की चाय की अड़ी की शुरुआत करने वाले मूलत: काशी से नहीं थे। आठवीं पास पप्पू का नाम विश्वनाथ सिंह है। उनके बाबा गणेश सोनभद्र से आए थे। पप्पू की चाय का जादू देसी ही नहीं, विदेशियों की जबान पर भी छाया है। इमरजेंसी के बाद उनकी ही अड़ी में जार्ज फर्नांडिस ने दो घंटे प्रेस कांफ्रेंस की थी।

बेहद खास है पप्पू की चाय
बनारसी कहते हैं कि चाय पिलाने के अंग्रेजी तरीके का भारतीय संस्करण होने के नाते लोग इसे पसंद करने लगे। पप्पू के यहां गर्म पानी और चाय पत्ती को मिलाकर पेय अलग से तैयार रहता है, इसे लीकर बोला जाता है, जिसे गिलासों में पहले से पड़े दूध, चीनी या नींबू में डाला जाता है।
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दूसरे विश्वयुद्ध का स्वाद आज भी है मौजूद
अस्सी के चाय की अड़ी के मनोज बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के मोर्चे से बाबा बाबू बलदेव सिंह बर्मा के फ्रंट पर तैनात थे। उनका मन नहीं लगा और नौकरी छोड़कर बनारस आ गए। अफसर मेस में बनने वाली अर्क चाय का स्वाद उनकी जबान पर था। अस्सी पर उन्होंने चाय की दुकान शुरू की तो धीरे-धीरे हर किसी की जबान पर उनकी चाय का स्वाद चढऩे लगा। महीने दो महीने में चाय की दुकान अड़ी में तब्दील हो गई। बाबा के बाद विश्वनाथ सिंह उर्फ पप्पू भइया ने दुकान संभाली और पीढ़ी दर पीढ़ी दुकान चल रही है।

लाजवाब स्वाद और ताजगी का राज
अस्सी की अड़ी की चाय के लाजवाब स्वाद और ताजगी का राज बेहद खास है। चाय बनाने वाले मनोज बताते हैं कि अर्क तैयार करने के लिए केतली में पानी को घंटों पकाना पड़ता है। उसी पानी की धार से कपड़ा वाली छननी में चाय की पत्ती डालकर हर गिलास में लीकर बूंद-बूंद टपकाते हैं। फिर अलग से दूध चीनी मिलाना। बड़े ही खास तरीके से चाय में चम्मच हिलाना। चाय की चुस्कियां लेने के अलावा उसे तैयार करते हुए देखना भी एक अनोखा अनुभव है।

जनांदोलन है अडिय़ों की देन
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य का कहना है कि चाय की अड़ियों पर साहित्यिक चर्चा ही नहीं होती बल्कि जबरदस्त राजनीतिक विमर्श भी होता है। चाय की अड़ियों से ही हिंदी आंदोलन, जेपी मूवमेंट, विश्वनाथ मंदिर सोना चोरी कांड से लेकर दीपा मेहता की फिल्म वाटर के विरोध में बड़ा जनांदोलन निकला। वक्त के साथ चाय की अड़ियों का अंदाज भी बदल गया।  पप्पू और पोई की चाय की दुकान बुजुर्ग अड़ीबाज तो चितरंजन पार्क पर राजा की दुकान पर युवा अड़ी लगाते हैं। विदेशी चाय प्रेमियों के लिए पांडेय घाट स्थित पकालू टी स्टाल पर 35 प्रकार की चाय पर्यटकों को पेश की जाती है।
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