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स्वतंत्रता दिवस: 14 अगस्त की रात बनारस में क्या-क्या हुआ था? आजादी की लड़ाई में मचा था हल्ला; पढ़ें अनोखा सच

Fri, 15 Aug 2025 12:43 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

देश की आजादी में बनारस का अहम योगदान रहा है। यहां के विभिन्न स्थानों पर स्वतंत्रता सेनानियों ने बैठकी कर अंग्रेजों को खदेड़ने की प्लानिंग तैयार की थी। 15 अगस्त के एक दिन पहले जिले का माहाैल कैसा था, इसके बारे में नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्याेमेश शुक्ला ने अहम जानकारियां दी।
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नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्याेमेश शुक्ला। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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India Independence Day: उस रात शहर के सारे रास्ते मैदागिन चौराहे के करीब टाउनहॉल की ओर घूम जा रहे थे। लगभग 20 हजार लोगों का जुलूस, 500 मशालों, 500 सिंगों और हजारों झंडों के साथ दशाश्वमेध घाट से तरह-तरह की आतिशबाजियां छोड़ता हुआ रात 11 बजे टाउनहॉल पहुंचा। 

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टाउनहॉल की ऐतिहासिक इमारत बिजली से जगमगा रही थी। 12:01 बजे पूरा शहर तोपों की गड़गड़ाहट से कांप उठा। तोपों के 31 गोले दागे गए। 54 आसमानी गोले भी छूटे। ऐन उसी समय सभी मिलों और फैक्टरियों के भोंपे एक साथ बज उठे। स्काउट दलों ने बिगुल बजाए। मंदिरों से उठती शंखध्वनि और मस्जिदों से आती अजान की आवाजें आसमान में एक-दूसरे से मिल गईं। 

औरंगाबाद में नाै मन भारी पीतल का घंटा बजाया गया। मुगलसराय वाले भी कहां पीछे हटने को तैयार थे। वहां से रेल के 100 इंजनों ने एक साथ सीटी दी। जिला मजिस्ट्रेट सिक्लेयर डे, सप्लाई अफसर उमाशंकर, शहर कोतवाल नसीर अहमद और कांग्रेसजनों-बैजनाथ सिंह, कृष्णचंद्र शर्मा और गिरिबाला देवी ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। पृष्ठभूमि में शहनाइयों के साथ बारहसिंगे भी लगातार बज रहे थे।

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आंदोलनों का सिलसिला और बनारसी प्रतिरोध का अनूठापन 
वर्ष 1921 में बनारस के सत्याग्रह में सांप्रदायिक एकता के विलक्षण दृश्य सामने आए। 30 सितंबर को टाउनहॉल में इकठ्ठा जनसमूह के बीच महान दार्शनिक भारत रत्न डॉ. भगवान दास ने विदेशी वस्त्रों के ढेर में आग लगाई। 

बाबू संपूर्णानंद की गिरफ्तारी के बाद इस शहर के 500 आदमी जेल गए। 1923 में साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला हुआ। असल आमना-सामना ज्ञानवापी मोड़ पर हुआ। एक तरफ पुलिस की नाकाबंदी दूसरी ओर काले झंडों का हुजूम। आसमान साइमन कमीशन वापस जाओ... के नारों से गूंज उठा। तब गली-गली में अवज्ञा थी। 

बनारस के लोग चिरपरिचित मौज में अत्याचार का सामना कर रहे थे। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, मादक पदार्थों का निषेध, पिकेटिंग, गिरफ्तारी और बनारस के शिल्प में प्रतिरोध का कोई नया दृश्य रच देना। बनारस के लोगों की भीड़ पुलिस के साथ खेल खेलती रही। संकीर्ण गलियों के रहस्य को भेदना असंभव था। 

गोपनीय समाचार-पत्र, पर्चे, जब्तशुदा साहित्य और स्वयं शचींद्र नाथ सान्याल, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और राजगुरु जैसे क्रांतिकारी बनारस के भीड़-भड़क्के और रहस्यमय भूगोल में जब मन आया छिप गए और जब जरूरत पड़ी सामने आ गए। बनारस गोपनीयता के बहुत काम आया। जब झंडे पर प्रतिबंध लगा तो लोढ़ेराम नाम के एक नौजवान ने गंगाजी के बीचों-बीच तैरते हुए झंडा फहरा दिया। बहुत से लोग इस घटना के साक्षी बने। आखिर बनारस के अलावा यह कहां हो सकता था ?

रामहल्ला
1781 के बाद, 1857 में भी हिंदू, मुसलमान और सिख मिलकर अंग्रेजों से भिड़ गए थे। इसके बाद 1890 में ‘रामहल्ले’ की समवेत ध्वनि के साथ बनारस के नागरिकों ने अंग्रेजों के साथ एक विचित्र लड़ाई लड़ी थी। भदैनी पंपिंग स्टेशन के लिए जमीन लेने की तैयारी हो रही थी। अस्सी नाले के पास बस्ती के पीछे का एक मंदिर योजना के अंतर्गत आता था।

म्यूनिसिपल बोर्ड की मीटिंग में तय हो गया कि मंदिर तोड़ा जाएगा। यह मीटिंग टाउनहॉल में हो रही थी। खबर जंगल की आग की तरह फैली। जनता टाउनहॉल में ही इकठ्ठा हो गई। भदैनी पर भी तीखा प्रतिरोध हुआ। गोरी सरकार को सिर्फ लाठी और गोली चलाना आता था, लेकिन उस दिन चैत्र नवरात्र का सातवां दिन था। धर्मप्राण जनता बगैर नेतृत्व के आप ही आप संगठित हो गई। सरकार को झुकना पड़ा।

गौरैयाशाही
1852 में गायों की बढ़ती हुई संख्या से घबराकर बनारस के अंग्रेज कलक्टर ने विश्वनाथजी के वाहन, शहर के ब्रांड एम्बेसडर शिव के वाहन नंदी के प्रतिरूप सांडों को पकड़कर बधिया करवाना शुरू किया। लोग उग्र हो गए। भरतमिलाप मैदान में सुलह वार्ता रखी गई। प्रशासन अपनी जिद पर अड़ा रहा। लोग लामबंद थे ही। माहौल हिंसक हो गया। लोगों ने आव देखा न ताव, पास की दुकानों से मिट्टी की खिलौना ‘गौरैया’ उठा-उठाकर कमिश्नर, कलक्टर और कोतवाल के ऊपर फेंकने लगे। यह घटना ‘गौरैयाशाही’ के नाम से मशहूर हुई।
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आजाद
असहयोग आंदोलन काशी में राजकीय संस्कृत कॉलेज की परीक्षाओं से शुरू हुआ। सत्याग्रही कॉलेज के सामने लेट गए। बनारस की सरजमीं पर ‘पिकेटिंग’ का यह पहला प्रयोग था। इस धरने में कई विद्यार्थी गिफ्तार हुए, जिसमें बारह साल का एक लड़का भी था। उसे बारह बेंत मारने की सजा हुई। संस्कृत के उस मेधावी विद्यार्थी ने सरेआम जिस साहस और धीरज के साथ बेंतों की मार का सामना किया, वह भारत के क्रांतिकारी आंदोलन का एक अध्याय ही बन गया। लड़के का नाम था चंद्रशेखर आजाद था
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