इंटरनेट से जम रहा काम
बढ़ती तकनीकी ने बनारस के काष्ठ व्यवसाय को काफी हद तक बढ़ाया है। बाजार के लिए तरस रहे बनारस के खिलौनों ने अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया में रंग जमाना शुरू कर दिया है। समय के साथ-साथ डिजाइन और स्वरूप बदलने से बनारस के लकड़ी उत्पादों का व्यवसाय बढ़ रहा है। थोक कारोबारियों के आर्डर पर अब इस काम से जुड़े कारीगरों को काम मिलने लगा है।
अमेरिका, यूरोप तक है मांग
अब शिल्पियों ने सिर्फ लकड़ी के पारंपरिक खिलौने बनाने की बजाय उनके रंग-रूप में काफी बदलाव किया है। यही नहीं, अब यह व्यवसाय खिलौनों तक ही सीमित नहीं रहा। लकड़ी से घर की साज-सज्जा के खूबसूरत उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। यही वजह है कि अब बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों खासकर यूरोप व अमेरिका को भी लुभा रहे हैं। लकड़ी से तैयार मूर्तियां भी खासी पसंद की जाती हैं।
एक नजर
- 3000 से 5000 लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं इस हुनर से
- 4000 से 5000 लोग जुड़े हैं खिलौना कारोबार से
- 30 से 35 करोड़ रुपये का है वार्षिक कारोबार
- 28 राज्यों तक जाता है यहां बना खिलौना
- 20 देशों में जाता है हाथ से बने लकड़ी के सामान व खिलौने
हस्त शिल्पियों को आर्थिक मदद मिले तो वह अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे। अभी तो कई दिक्कतें हस्तशिल्पियों के समक्ष हैं। जीएसटी में भी छूट मिलनी चाहिए।
प्रेम शंकर विश्वकर्मा, हस्तशिल्पी, लहरतारा
चीनी खिलौनों के बंद होने के बाद अपने यहां के खिलौनों की मांग बढ़ेगी। हालांकि इस कोरोना काल में कारोबार प्रभावित है। लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही रफ्तार पकड़ेगा।
रमेशचंद्र विश्वकर्मा, हस्तशिल्पी, हरहुआ
तकनीकी प्रशिक्षण मिलना शुरू हो जाए तो यहां के शिल्पी एक से बढ़कर एक खिलौने बनाना शुरू कर दें। बस उन्हें थोड़ी प्रोत्साहन की जरूरत है।
अशोक कुमार शर्मा, हस्तशिल्पी, करोमा
बनारसी काष्ठ कला की पहचान दुनिया भर में है। चीनी खिलौनों को मात देने में यहां के कारीगर अव्वल है। थोड़ी सी सरकार से यदि इन उद्योगों को राहत मिल जाए, कारीगरों को ट्रेनिंग मिले तो फिर यह उद्योग उड़ान भर सकेगा। हुनर की कमी अपने यहां नहीं है।
डॉ रजनीकांत मिश्रा, पद्मश्री, जीआई एक्सपर्ट