वाराणसी। वर्ष 2013 में मामूली सी बात पर सहारनपुर के देवबंद में दो गुट आमने-सामने आ गए थे। मैं और तत्कालीन डीएम संध्या तिवारी मौके पर पहुंचे तो मामला गंभीर दिखाई दिया। तभी एक स्थानीय नागरिक ने कहा कि अगर अजय भइया डीएम होते तो मामला तुरंत शांत हो गया होता। उत्सुकतावश उससे पूछा कि ऐसा क्या करते तो वह बोला- दोनों तरफ के लोग मरने मारने पर उतारू हैं और वे तो इतना मीठा बोलते कि लोग अनायास ही उनसे बात करने आ जाते। मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान सहारनपुर के देवबंद तक का माहौल गर्म था, उस समय अजय कुमार सिंह बतौर डीएम सहारनपुर में तैनात थे। उनके तबादले के बाद ही मैंने वहां एसएसपी के रूप में ज्वाइन किया था। जब भी किसी संवेदनशील मौके पर तत्कालीन जिलाधिकारी संध्या तिवारी के साथ जाता तो शहर के गणमान्य लोग अजय कुमार सिंह की चर्चा जरूर करते थे। लखनऊ में बतौर एसएसपी उनसे कई मुलाकातें हुईं। उनकी मीठी आवाज, साधारण पहनावा उन्हें सबसे अलग करता था। करीब 15 दिन पहले मेरी फोन पर बात हुई तो बोले- कभी लखनऊ आइए तो मुलाकात हो, नहीं तो मैं ही बरेली आता हूं। -राजेश पांडेय, डीआईजी, बरेली रेंज
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बतौर कमिश्नर सहारनपुर में ज्वाइन किया। उस समय अजय कुमार सिंह सहारनपुर में जिलाधिकारी थे। उनकी सबसे अच्छी बात यह थी कि चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए वे हर बात बहुत धीरे और प्यार से बोलते थे। हमारे बीच बहुत अच्छा सामंजस्य रहा। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद तैनाती के कारण मेरा ज्यादा समय वहीं बीतता था, मगर इस दौरान वे लगातार संपर्क में रहते। शामली और सहारनपुर में जनता से उनका संवाद बहुत अच्छा था और यही कारण था कि वे वहां लोकप्रिय भी थे। इस तैनाती के बाद हमारी मुलाकात तो बहुत कम हुई, लेकिन जब भी बात होती तो वे सहारनपुर की चर्चा जरूर करते थे। उन्हें देखकर कभी ऐसा नहीं लगता था कि इतनी कम उम्र में वे दुनिया छोड़कर चले जाएंगे। उनका निधन समाज के लिए बड़ी क्षति है। -भुवनेश कुमार, प्रमुख सचिव, दुग्ध, मत्स्य, पशुपालन विभाग