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Varanasi News: मैं रामजी को नहीं देख सकता पर वो मुझे जरूर देखते होंगे, इसी उम्मीद से रामलीला में आता हूं

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- रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला के एकमात्र दिव्यांग (जन्मांध) दर्शक हैं स्वामी रामदास बाबा
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- अयोध्या से काशी आकर नियमित होते हैं रामलीला में शामिल, कोई न कोई दे देता है सहारा
अमरेंद्र पांडेय
पीडीडीयू नगर। बाबा, आप रामलीला में क्यों आते हैं जब दोनों आंखों से दिखाई ही नहीं देता, इतनी परेशानी झेलने की क्या जरूरत है? यह सवाल सुनकर रामदास बाबा का गला भर आया। थोड़ी देर रुके और विह्वल होकर बोले, बच्चा, मैं देख नहीं सकता पर मेरे प्रभु रामजी तो मुझे देखते होंगे। इसी उम्मीद से रामलीला में आता हूं कि कभी प्रभु की नजर इस अधम पर पड़ जाए तो जीवन संवर जाए। रामनगर की रामलीला देखने वैसे तो हजारों लोग आते हैं, लेकिन स्वामी रामदास बाबा एकमात्र दिव्यांग (जन्मांध) हैं जो लीला में आते हैं।
यूनेस्को के विश्व धरोहर में शामिल रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला 223 वर्ष पुरानी है। इसकी खासियत है कि यह आज भी पुरातन संसाधनों के माध्यम से होती है। लीला में न तो आधुनिक लाइटें लगाई जाती हैं और न ही लाउडस्पीकर। चुप रहो, सावधान.. कहने मात्र से हजारों की भीड़ में सन्नाटा छा जाता है। रामलीला के पात्र नियम, संयम और अनुशासन के बीच रहते हैं। लीला से भी अद्भुत हैं इसके नेमी, जो चाहे जिस पेशे में हों, अपना सबकुछ छोड़कर एक महीने लीला को समर्पित कर देते हैं।
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इन्हीं नेमियों में एक हैं अयोध्या के साधु स्वामी रामदास बाबा, जिनकी बचपन से दोनों आंखें नहीं हैं। 75 की उम्र में शरीर भले कमजोर हो गया हो, खड़े होने पर पांव कांपने लगते हों पर रामलीला में नियमित शामिल होते हैं। रोजाना लीला में शामिल होने वाले हजारों भक्तों में यह एकमात्र भक्त हैं जो जन्मांध हैं। बाकि लोग राम, लक्ष्मण, सीता और अन्य पात्रों के स्वरूपों के दर्शन के लिए लीला में आते हैं पर रामदास जी लीला में इसलिए आते हैं कि उन्हें भगवान देख लें। कहते हैं कि भगवान को नहीं देख सकता पर उनकी आवाज सुनता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। संवाद
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रामलीला की महिमा खींच लाई काशी
मूल रूप से बिहार के छपरा जिले के निवासी बाबा रामदास बचपन से ही जन्मांध थे। प्रभु के प्रति बचपन से ही अनुराग था तो संन्यासी बन गए और अयोध्या चले आए। वहां देश-विदेश के साधु संतों से मुलाकात होती थी। उनमें से ही मिर्जापुर के नारायणपुर स्थित डोमरी के बाबा आनंद दास ने उन्हें रामलीला के बारे में बताया। बाबा रामदास लीला के बारे में सुनकर भावुक हो गए और कहने लगे कि क्या मुझे वहां ले जा सकते हैं। पहले तो आनंद दास ने संकोच किया कि भला ये कैसे लीला देखेंगे, लेकिन फिर उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनको आने के लिए कहा। रामलीला के कुछ दिन पहले वे आनंद दास के पास आए। आनंद दास ही बाइक से उन्हें रोज लीला स्थल पर ले आते हैं, उनके न रहने पर किसी न किसी से सहारा मांगते हैं।
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