ऐसे में गरीबों को हर महीने दिए जाने वाले राशन को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो चुका है कि आखिर गरीबी की मजाक सरकार के स्तर से उड़ाया जा रहा या फिर कोटेदारों की खुद के कारस्तानी का काला सच है।
उधर कोटे पर राशन के लिए पहुंचे कार्डधारकों का भी कहना है कि सरकारी कोटे की दुकान से दिया जाने वाला यह राशन खाने लायक नहीं रहता। बदबू भरा गेहूं और चावल बहुत ही मजबूरी में गरीब अपने हलक में उतारने को विवश हैं।