फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हरे रामा सैंया गए परदेस सवनवां बीतल जाला ना

Thu, 28 Jul 2016 01:25 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
विज्ञापन
पूर्वांचल में कजरी एक तरफ खेत-खलिहानों का गीत है तो दूसरी ओर नायिका के प्रेम और विरह का दर्पण भी है। कजरी कहीं प्रियतम को लिखी जाने वाली चिट्ठी से शुरू होती है तो कहीं कोयल, पपीहे की विरह भरी बोली से। इसका धार्मिक पक्ष भी खूब प्रतिबिंबित हुआ है। राधा-कृष्ण, राम-सीता और शिव-पार्वती की आराधना पर आधारित कजरी भी पूरब में खूब गाई जाती है। लोक गीतों में कजरी के महत्व और उसके आकर्षण के बारे में देखिए क्या कहते हैं लोकगीत गायक डॉ. मन्नू यादव।
विज्ञापन



सावन की घेर-घार करती घटाएं, गरजते-तरजते बादल और चमकती-दमकती बिजली लोक गीतों में कजरी की आत्मा के रूप में सामने आती है। रिमझिम फुहारें हों और बनारस, मिर्जापुर, जौनपुर, चंदौली, सोनभद्र से लगे इलाकों में आम-नीम की डालियों पर झूले न पड़ जाएं, ऐसा नहीं हो सकता। सावन से पहले ही झूले के लिए खास तौर से मजबूत रस्सियां बनाई जाने लगती हैं। ससुराल से दुल्हनें विदा होकर नैहर आ जाती हैं। कोठा-अंटारियों पर भी घर की बहू-बेटियों के लिए झूले पड़ने लगते हैं। यह कहना है लोक गीत गायक डॉ. मन्नू यादव का।


 अपने सुरों की बदौलत पूरब की मिट्टी की खुशबू दूर-दूर तक फैलाने वाले मन्नू कहते हैं कि शृंगार प्रधान गीत कजरी में संयोग, वियोग दोनों की प्रधानता है। इसके साथ ही धार्मिक पक्ष भी इसका बहुत समृद्ध है। मिर्जापुर में कज्जला देवी की आराधना का गीत है कजरी तो आम तौर पर इसमें राधा-कृष्ण, राम-सीता की आराधना की गूंज सुनाई देती है। कजरी की धुनों में मेघों के सांवरे-सलोने रूप की तुलना श्याम-सलोने से की जाती है। वह कजरी सुनाते हैं-राधा झूलैं कृष्ण झुलावें...। वह कहतें हैं कि बादलों के विविध रूप-रंगों का बखान भी कजरी में खूब किया गया है- सखि बरसे बदरवा से मोती/अंचरवा से बूंद टपके..। बारिश की बूंदें विरहिन के आंचल में लंबे इंतजार के बाद मोती की तरह महसूस होती हैं। वह फिर गजरी गुनगुनाते हैं- हरे रामा सैंया गए परदेस सवनवां बीतल जाला ना/ बदरा जियरा मोर डरावै/जियरा पपिहा मोर जरावै रामा/अचके बेधे बाउर मदनवा सवनवां बीतल जाला ना..।
विज्ञापन



वह बताते हैं कि सखि, सांवरिया, श्याम, घनश्याम, कन्हैया, हरे रामा, मोरे हरी, बलमू, सैंया, पियवा जैसे अनेक गीतों के टेक कजरी गायन विधा के प्रेम प्रधान होने के उदाहरण हैं। खास तौर से किसानों की मेहनत का समृद्धि के रूप में खेत-खलिहान में लहलहाती उपज भी कजरी में साकार हुई है। पूर्वांचल से लेकर बुंदेलखंड, अवध से लेकर यूपी, बिहार, झारखंड, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़ के इलाकों से लेकर हरियाणा, राजस्थान की सीमा के अहीरवाल इलाके तक कजरी के सुर बरबस लोगों का ध्यान खींचते हैं। उन इलाकों में इसे हड़ौती गीत के नाम से जानते हैं। वह कजरी में प्रकृति दर्शन कराते हैं- बादर गरजत पानी बरसत मूसराधार बहत बा/नदी नार कछार बहत बा/गंगा जी क धार बहत बा ना...।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें