जब से चीन ने बनारस की ही नकल कर टंकी वाली प्लास्टिक की पिचकारियों को भी बाजार में उतार दिया था, इस कारण हस्त निर्मित पिचकारियों पर संकट आ गया था, जबकि वह टिकाऊ भी नहीं है, यूज एंड थ्रू वाला होता है। लेकिन हम लोगों ने उत्पादन जारी रखा, और इस वर्ष अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। पदमश्री से सम्मानित जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनी कांत बताते है कि पीतल की पिचकारियों का दौर कोरोना के चलते लौट आया।
कसेरा महासभा के सदस्य और राज्य पुरस्कार से सम्मानित शिल्पी अनिल कसेरा का कहना है कि सरकार की बनारस के मेटल के उत्पादों को मुरादाबाद और अलीगढ़ की ही तरह पूरा सहयोग करना चाहिए, क्योंकि बनारस का मेटल उत्पाद देश में बहुत ही पुराना, परंपरागत और जीआई पंजीकृत उत्पाद है। सरकार को बनारस के धातु शिल्पियों आगे बढ़ाने के लिए कॉमन फैसिलिटी केंद्र, रॉ मेटेरियल डिपो की स्थापना के साथ ही, सौर उर्जा सब्सिडी देना चाहिए।