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गणतंत्र दिवस की झांकी, यूरोप-अमेरिका में शोभा बढ़ाते थे काशी में बने लकड़ी के खिलौने

Sun, 02 Feb 2020 12:31 PM IST
गीतार्जुन गौतम अजय राय, अमर उजाला, वाराणसी
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लकड़ी से बने खिलौने। - फोटो : अमर उजाला।
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काशी जितनी आध्यात्म में है, उससे ज्यादा लोक के रंग में रंगी है। यह धाम ही नहीं बल्कि शिल्प की भी नगरी है। बुनकरों, कलाकारों और संगीतकारों की धरती पर लकड़ी के खिलौनों की चमक कुछ अलग ही होती है। यहां के लकड़ी के खिलौने कभी यूरोप और अमेरिका में क्रिसमस की शोभा बढ़ाते थे। वर्ष 2005 में गणतंत्र दिवस की परेड में इन्हीं खिलौनों से सजी उत्तर प्रदेश की झांकी को तीसरा स्थान मिला था। मगर अब इनकी चमक फीकी पड़ती जा रही है। शिल्पियों का कहना है कि जब उनकी रंगत उड़ गई है तो शिल्प में चमक कहां से होगी।

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ऐसे वक्त में जब प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति ललक बढ़ी है, बनारस के लकड़ी के खिलौने पूरी तरह से इको फ्रेंडली होने के बावजूद मात खा रहे हैं। ये खिलौने ऐसे होते थे, जिन्हें बच्चे मुंह में लेकर चूसते रहते थे लेकिन उनकी सेहत को जरा भी नुकसान नहीं होता था। दरअसल खिलौने कोरैया लकड़ी के बनते थे और उनको लाख में बुकनी जैसे प्राकृतिक रंगों से मिलाकर बनाया जाता था। ये सुंदर तो इतने होते हैं कि इनको खेलने के लिए कम और सजाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

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खोजवां क्षेत्र के कश्मीरीगंज में खिलौने गढ़े जाते हैं। कभी इस इलाके में दिन भर खिलौने का सृजन संगीत सुनाई देता था। लकड़ी को घिसने, काटने का स्वर, लय गूंजता रहता था। पर अब यह कम होता जा रहा है। उद्योग से 65 साल से जुड़े कलाकार गोदावरी सिंह बताते हैं कि कच्चा माल नहीं मिलने और बिजली की बढ़ती दरों के चलते यह उद्योग पहले से ही चौपट हो रहा था, ऊपर से सरकार ने इसे जीएसटी के दायरे में ला दिया है। बिजली की दरों में बढ़ोतरी के चलते खिलौने उद्योग से जुड़े तमाम लोगों के घर तक बिक गए।

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60 साल से खिलौने बना रहे जवाहर बताते हैं कि ये खिलौने कोरैया लकड़ी से बनाए जाते थे, जो टिकाऊ होते थे और उनमें चमक भी अच्छी रहती थी। वन विभाग के प्रतिबंध के बाद कोरैया लकड़ी का कटना बंद हो गया। इससे गुणवत्ता प्रभावित हुई है। कोरैया की जगह अब यूकेलिप्टस का इस्तेमाल हो रहा है, जो टिकाऊ नहीं होता।



ब्रह्मानंद वर्मा बताते हैं कि पहले क्रिसमस पर एंजल, लिटिल लेडी, घंटी, सेंटा क्लाज आदि बनाकर विदेशों में भेजना पड़ता था। इसकी तैयारी तीन महीने पहले से शुरू हो जाती थी। पर कच्चे माल की किल्लत और बिजली की मार से उद्योग बंद होने की कगार पर है। बाबू लाल का कहना है कि लाख, लकड़ी और सस्ती बिजली मिले तो कारोबार में जान आ सकती है। लकड़ियां और रंगों का मिलना भी दुर्लभ हो गया है। घाटे का सौदा होने के कारण पर नई पीढ़ी काम नहीं सीखना चाहती है। हमारी हालत ऐसी है कि यदि 10 हजार रुपये की जरूरत पड़ जाए तो जुटाना मुश्किल है। जब शिल्पकार नहीं चमकेगा तो उसका शिल्प कैसे चमकेगा।
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