60 साल से खिलौने बना रहे जवाहर बताते हैं कि ये खिलौने कोरैया लकड़ी से बनाए जाते थे, जो टिकाऊ होते थे और उनमें चमक भी अच्छी रहती थी। वन विभाग के प्रतिबंध के बाद कोरैया लकड़ी का कटना बंद हो गया। इससे गुणवत्ता प्रभावित हुई है। कोरैया की जगह अब यूकेलिप्टस का इस्तेमाल हो रहा है, जो टिकाऊ नहीं होता।
ब्रह्मानंद वर्मा बताते हैं कि पहले क्रिसमस पर एंजल, लिटिल लेडी, घंटी, सेंटा क्लाज आदि बनाकर विदेशों में भेजना पड़ता था। इसकी तैयारी तीन महीने पहले से शुरू हो जाती थी। पर कच्चे माल की किल्लत और बिजली की मार से उद्योग बंद होने की कगार पर है। बाबू लाल का कहना है कि लाख, लकड़ी और सस्ती बिजली मिले तो कारोबार में जान आ सकती है। लकड़ियां और रंगों का मिलना भी दुर्लभ हो गया है। घाटे का सौदा होने के कारण पर नई पीढ़ी काम नहीं सीखना चाहती है। हमारी हालत ऐसी है कि यदि 10 हजार रुपये की जरूरत पड़ जाए तो जुटाना मुश्किल है। जब शिल्पकार नहीं चमकेगा तो उसका शिल्प कैसे चमकेगा।